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________________ अध्यायः दसवां 11 [ ८५१ उल्लंघन कर जप करता है अथवा जो उंगुली के नख के अग्रभाग से जप करता है वह सब निष्फल होता है । लिखा भी है--- व्यग्रचित्तेन यज्जप्तं यज्जप्तं भेकलंघने । नखानाच यज्जत तज्जतं निकल भवत् ।। इस प्रकरण में माला के भेद इस प्रकार समझाना चाहिये, क्रियाकोश में लिखा है-- प्रथमफटिकमरिण मोती माल सोना रूपा सुरंग प्रवाल । जीधा पोता रेशम जान कमलबीज फुनि सूत वखान ॥ यह नवभांति जाप के भेद भजिये जिनवर, तजि मनखेद ॥१७५४॥ दूसरी जगह भी लिखा है--- सूत्तस्य जाप्यमालायाः सदा जापःसुखावहः । दाध मुदस्थि काष्ठानाम क्षमालाऽफलप्रदा ॥ सुवर्ण रौप्यविन्दुममोक्तिका जपमालिकाः ।। उपवाससहस्त्राणां फलं यच्छन्ति जापतः ॥१७५४॥ अर्थात् सूत को माला सदा सुख देने वाली है। अग्नि के द्वारा पकी हुई मिट्टी, हड्डी, लकड़ी और रुद्राक्ष आदि की मालायें कुछ देने वाली नहीं है, ये मालायें अयोग्य हैं, ग्रहण करने योग्य नहीं है । अर्थात् इनसे जप नहीं करना चाहिये तथा सोना, चांदी, मूंगा और मोती की माला हजारों उपवासों का फल देने वाली है। इनकी मालाओं के द्वारा जप करने से हजारों उपवासों का फल मिलता है । इस प्रकार मालाओं का फल बतलाया है। प्रश्न :--जाप करते समय एमोकार मंत्र का उच्चारण किस प्रकार करना चाहिये ? उत्तर-एक णमोकार मन्त्र का उच्चारण ३ श्वाच्छोश्वास में करना चाहिये। उसकी विधि इस प्रकार है-श्वास को खींचते समय "गमों परहंतार" यह पद पढ़ना चाहिये । फिर श्वास को छोड़ते समय "मो सिद्धाणं" यह पद पढ़ना चाहिये। श्वास को खींचते समय "रगमो आयरियागं" पढ़ना चाहिये । फिर श्वास छोड़ते समय "रणमो उज्झायाणे" पढ़ना चाहिये । श्वास को खींचते समय "मो लोए" पढना
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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