SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 942
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५५२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि चाहिये। फिर छोड़ते समय "सव्व साहरा" पढ़ना चाहिये । इस प्रकार तीन श्वाच्छो. श्वास में एक बार का णमोकार मन्त्र का जप हुआ, जाप करते समय इसी प्रकार शुद्ध उच्चारण करना चाहिये । धर्मरसिक में लिखा भी है-- नमस्कारपदान् पंच जपेद्यथावकाशकम् । अष्टोत्तर शतं चामिष्टा विशतिक तथा ॥१७५५॥ दिद्वयकपर विश्रामा उश्वासा सप्तविंशतिः । सर्व पाप क्षयं याति जप्ते पंचनमस्कृते ॥१७५६॥ अर्थात् समय मिलने पर णमोकार मन्त्र को १०८ बार जपे अथवा ५४ बार जप करे अथवा २८ बार जप करे। एक-एक श्वास में श्वास और उन्छास दोनों में दो-दो पद विश्राम देकर जपे। इस प्रकार २७ श्वाच्छोश्वास द्वारा ६ बार नमस्कार मन्त्र का जाप करें। इस प्रकार जप करने से समस्त-समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं । यहां पर जो २७ श्वास बतलाये हैं। सो एक कायोत्सर्ग में बार नमस्कार मन्त्र जपने को अपेक्षा से बतलाये हैं। इस प्रकार इस मन्त्र को वाचक, उपासु और मानस इन ३ प्रकार से अपनी शक्ति के अनुसार पढ़ना चाहिये, जपना चाहिये । प्रश्न :-नमस्कार मन्त्र पढ़ने के जो वाचिक, उपांसु और मानस ये ३ भेद बतलाये सो इनका स्वरूप क्या है ? उत्तर :--स्वर के तीन भेद है उदात्त, अनुदात्त और स्वरित 1 जिसमें इन तीनों का उच्चारण स्पष्ट हो। ऐसे मंत्रों के अक्षर, पद और शब्दों को स्पष्ट और शुद्ध रीति से उच्चारण करना और इस प्रकार उच्चारण करना जिसको सब सुन लें, उसको वाचिक कहते हैं। तथा जिसमें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित के भेद से अक्षर, पद, शब्दों का उच्चारण शुद्ध तथा स्पष्ट हो, परन्तु उस उच्चारण को कोई दूसरा सुन न सके, उसको उपांसु कहते हैं । वाचिक व उपांसु में सुनने, न सुनने का हो अन्तर है । वाचिक जप को सब सुन सकते हैं और उपांसु जप को पास बैठने वाला भी नहीं सुन सकता तथा अपने मन को एकाग्र कर अपने ही मन के द्वारा चिन्तवन करना और वह चिन्तवन इस प्रकार करना, जिसमें मन्त्रों की जो अक्षरमाला है, मन्त्रों में जो अक्षरों का समुदाय है, उसके अक्षर पद और शब्द सब शुद्ध तथा स्पष्ट चिन्तवन करने में पा जायें, ऐसे जप को मानसिक जप कहते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy