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________________ Nmpie अध्याय : दसवां ] [ ८५३ ___इसका फल इस प्रकार है---मानसिक जप समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए किया जाता है, उपांसु जप पुत्र-प्राप्ति के लिए किया जाता है और वाचिक धन-लाभ के लिए किया जाता है । वाचिक का फल एक गुना है, उपांसु का फल सौगुना है और मानसिक जप का फल एक हजार गुना है । ऐसा. श्री जिनसेनाचार्य ने कहा है धाचिकास्य उपांशुश्च मानसस्त्रि विधः स्मृतः । त्रयाणां जपमालानां स्याच्छे ष्ठोझा सरोतरः ॥१७५७॥ यदुस्थनीचस्वरितः शब्दः स्पष्टपदाक्षरः । मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा जपो रोयः स बाधिकः ॥१७५८॥ शनरुच्चारयेन्मन्त्रं मन्चमोष्ठी प्रचालयेत् । अपररश्रतः किंचित्स उपांसुर्जपः स्मृतः ॥१७५६॥ विधाय चाक्षर श्रेण्यावरप्तर्ग पदात्पदम् । शब्दार्थ चिन्तनं भूयः कथ्यते मानसो जपः ।।१७६०॥ मानसः सिद्धिकाम्यानां पुत्रकाम उपांशुकः । वाधिको धनलाभाय प्रशस्तो जप ईरितः ॥१७६१॥ वाधिकस्त्वेक एक्स्वायुपांशु शत उच्यते । सहस्र मानसं प्रोक्तं जिनसेनादि सूरिभिः ॥१७६२॥ प्राचार्यों ने गमोकार मंत्र आदि मंत्रों के जपने की विधि इस प्रकार बतलाई HIN ETITA .. jfor 3 . प्रश्न :--ऊपर के जो जप से भेद बतलाये हैं, वे किस प्रासन पर बैठकर करमा चाहिये ? उत्तर :-सफेद वस्त्र प्रासन पर तथा हल्दी से रंगे हुये वस्त्र के प्रासन पर व सबसे उत्तम काल वस्त्र के आसन पर वा डाभ के आसन पर बैठकर जप करना चाहिये मोकार मंत्र का व अन्य मन्त्रों का जप करने के लिये अथवा भगवान अरहंतदेव की पूजा करने के लिये ऊपर लिखे चार प्रकार के आसनों में से किसी एक प्रासन पर बैठकर जप वा पूजा करने का विधान प्राचार्यों ने बतलाया है । इसके सिवाय और भी अनेक प्रकार के आसन हैं । परन्तु उन पर बैठकर कभी भी जप व पूजा नहीं करनी चाहिये । जो मनुष्य इन ऊपर लिखे ४ आसनों के सिवाय अन्य आसनों पर बैठकर पूजा व अप करता है । उसका फल उसके लिये बहुत बुरा होता है । जैसे जो
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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