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________________ .. ७८६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि १. अयोध्या-सेनापति रत्न-सेनानायक-आर्यखंड और उत्तम, मध्यम म्लेच्छखंड सिवाय अन्य दिग्विष्टरों को जीतने वाला सेनापति रत्न । भद्रमुख हर्म्यपति-गृहपतिरत्न - भंडारी-राजमहल का व्यवहार चलाने वाला और हिसाब-किताब रखने वाला गृहपति रत्न होता है । बुद्धिसमुद्र-पुरोहितरत्न-सबको धर्म-कर्मानुष्ठान पूर्वक मार्गदर्शन कराने वाला पुरोहित रत्न होता है। ___ कामवृष्टि-रथपति-तक्षकरत्न-उत्तम कारीगर-चक्रवर्ती के आलोचनानुसार महल, मंदिर, प्रासाद आदि को तैयार करने वाला तक्षकरन । ५. सुभद्रा-सुति-स्त्रीरत्न चक्रवती के ६६ हजार स्त्रियों के सिवाय जो मुख्य पट्टरानी होती है, वह ही स्त्रीरत्न है । विजयागिरि गजपतिरत्न-अरिनपों के गजघटाओं का विघटन करने वाला गजरत्न होता है। ७. पवनंजय-प्रश्वरत्न--तिमिश्र गुफा के कपाट को विघटन करते समय १२ योजन दौड़ने वाला अश्वरत्न होता है। इस प्रकार यह ७ सजीव रत्न कहलाते हैं। सुदर्शन-चतु-प्रायुध-बैरियों का संहार (अभाव) करने वाला चक्ररत्न होता है। सूर्यप्रभ-छत्ररत्न-आयुध--- सैन्यों के ऊपर आने वाली बाधाओं को दूर करने वाले छत्ररत्न होते हैं । भद्रमुख-असि-खंगरत्न-पायुध--चक्रवतियों के चित्तोत्सव को करने वाले असिरत्न होते हैं। प्रवृद्धवंग-दण्ड रत्न-पायुध---चक्रवतियों के सैन्य की जमीन को साफ कर देने वाला दण्डरल्न । चित्ताजननी-काकिणीरत्न---गुफा प्रादि में रहने वाले अंधकार के स्थानों में चन्द्रादित्यों के समान प्रकाश देने वाला काकिणीरत्न होता है। चूडामगिरत्न-रत्नविशेष:- इच्छित पदार्थ को देने वाला चूडामणि रत्न चर्मरत्न--सैन्यादिकों को नद और नदी से सुरक्षित रीति से पार करा देने बाला चर्मरत्न होता है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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