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________________ अध्याय : नौवां । [ ७८५ (४) चक्षुरिन्तिम से ४३२६६ ७ अटे २३ पोजन तक देख सकते हैं। (५) श्रोत्रेन्द्रिय से १२ योजन तक का शब्द सुनते हैं । चक्रवर्ती के ७ अंगवलों का स्वरूप-- १. स्वामी, २. अमात्य, ३. देश, ४. दुर्ग, ५. खजाना (कोश), ६. षडंग बल, ७. मित्र (सुहत्) इस प्रकार सात अंगवल होते हैं। चक्रवर्ती का षडंग (६ प्रकार का) बल-- १. ८४ लाख भद्र हाथी होते हैं, २. ८४ लाख रथ होते हैं, ३. १८ करोड़ जातिवंत (सुलक्षण ) घोड़े होते हैं, ४.८४ करोड वीर भट (पैदलसैनिक) होते हैं। ५. असंख्यात विद्याधर सैन्य होते हैं, इस प्रकार चक्रवर्ती का षडंगबल समझना चाहिये। चक्रवर्ती के दशांग भोग-- १. दिव्यपुर (पट्टण), २. दिव्यभाजन, ३. दिव्यभोजन, ४. दिव्यशटया, ५. दिव्यग्रासन, ६. दिव्यनाटक, . ७. दिव्यरत्न, ८. दिव्य निधि, ६. दिव्यसैन्य, १०. दिव्यवाहन इस प्रकार दशांग भोग होते हैं। चक्रवर्ती की नवनिधि और उनकी फलवान शक्ति १. कालनिधि-ऋतु के अनुसार नानाविधि पदार्थ देने वाला होता है । २. महाकालनिधि-नानाविधभाजन पदार्थ देने वाला होता है। मारण्वक आयुध पिंगल आभरण नैसर्घ , मन्दिर ६.. पद्य वस्त्र ७. पांडुककाल निधि नानाविध धान्य पदार्थ देने वाला होता है। . ८. शंख , वादित्र . ६. सर्वरत्न (नानारत्न) निधि - नानाविधरत्न देने वाला होता है । ये सब निधिया नदीमुख में उत्पन्न होती रहती हैं। चक्रवती के १४ रत्न और उनको फलदान शक्ति चक छत्रमसिदडो . मणिश्चर्म च काकिणों। गृह सेनापतिस्तक्षा पूरोधोऽश्वगजस्त्रियः ।।१६२२॥ e
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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