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________________ ७६४ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि आने वाले डtaff काल में ही ऐसी अभूतपूर्व घटनाएँ होती हैं। जिन शासन के मध्य में विपरीत अनेक मतों की उत्पत्ति होता, वस्त्र धारण करके निंदनीय सग्रंथ गिधारी संप्रदाय का प्रादुर्भाव, जिनेन्द्र भगवान पर उपसर्ग होना, चक्रवर्ती का मान भंग, कुदेव, उनके मठ, उनकी मूर्ति आदि का होना, अनेक मिथ्या शास्त्रों का निर्वाण होना तथा भरत का बाहुबलि द्वारा मानभंग सदृश कार्य हुए हैं। कहा भी है जिनशासनमध्ये स्युः विपरीता मतान्तराः । atararaar निद्याः सग्रन्थाः संति लिंगिनः ॥१६१६॥ उपसर्गाद्रा, मानश्च चक्रिरणाम् । कुदेव - मठ - मूर्त्यांचा: शास्त्राणि श्रनेकशः ॥ १६२०॥ इस सम्बन्ध में यह भी गाथा प्रसिद्ध है। हुंडा पोकाले खियमेण भवंति पंचपावंडाः । afteहरमा मंगो उवसगो जिणवरिवारणं ।। १६२१|| भरत बाहुबलि आदि का उपरोक्त वर्णन भूतपूर्व नैगमनय की अपेक्षा से किया जाता है | आज तो वे सभी समान श्रात्मगुणों से शोभायमान सिद्ध परमात्मा रूप में ईषत्प्रागभार नाम की अष्टम पृथ्वी पर विराजमान हैं। वह स्थान सर्वार्थसिद्धि से केवल द्वादश योजन दूरी पर स्थित है । प्रश्न :- चक्रवर्ती के चार प्रकार की राजविद्या कौनसी है ? उत्तर :- - ( १ ) ग्रान्वीक्षिकी अपना स्वरूप जानना, अपना बल पहिचानना, अच्छा बुरा समझ लेना, सच्चा झूठा समझ लेना, रत्न परीक्षक जिस तरह रत्न की परीक्षा करता है, उसी तरह पहिचानना । (२) त्रयी - शास्त्रानुसार धर्म-अधर्म समझ कर, अधर्म छोड़ देना और धर्म में प्रवृत्ति करना । (३) बार्ता - अर्थ - अनर्थ को समझकर प्रजाजनों का रक्षण करना । (४) दंडनीय - दुष्ट दण्डनीयादि । (देखो महापुराणपर्व ४ ) प्रश्न :- चक्रवती के पांच इन्द्रियों का विषय बल स्वरूप कंसा है ? - ( १ ) स्पर्शवेन्द्रिय से ६ योजन तक का विषय जान लेते हैं । (२) रसनेन्द्रिय से उत्तर :-- (३) पारणेन्द्रिय से " "3 " "
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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