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अध्याय : नौवां 1
। ७८३ अनादिकालं मिथ्यात्वोदयोद्रेकात् नित्यनिगोदपर्यायमनुभय भरतक्रिया: पुनः भूत्वा भद्र-विवर्धनादयस्त्रयोविंशत्यधिक्रनवशतसंख्या: पुरुदेवपादे श्रुत धर्मसारा: समारोपितरत्नत्रया: अल्पकालेनैव सिद्धाः" (पृ० ६६ मूलाराधना) ।
हरिवंश पुराण सर्ग १२ में भी उक्त बात का उल्लेख पाया है :अहष्टपूर्वतीर्थेशाः प्रविष्टाः समवस्थितिम् । कदाचिच्चकिरणा सार्धं विवर्धनपुरोगमाः ॥१६१४॥ क्लिष्टा स्थावरकायेष्वनाविमिथ्यात्व दृष्टयः। दृष्ट्वा भगवतो लक्ष्मी राजपुत्राः सुविस्मिताः ।।१६१५॥ अंतर्मुहूर्तकालेन प्रतिपन्नसुसंयमाः । त्रयोविशान्यहो चित्रं शतानि नभिर्बभुः ।।१६१६॥
भद्र-विवर्धन आदि राजपुत्रों का चारिन किस मानव के हृदय में प्रात्मविकास का प्रेम उत्पन्न न करेगा।
स्वयं भरतेश्वर का आध्यात्मिक जीवन मुमुक्षु वर्ग के लिए चमत्कार का जनक रहा है । चक्रवर्ती ने मुनि पदवी धारण करते समय केशों का लोच किया था, और तत्काल ही भरत, जो कुछ समय पूर्व लौकिक साम्राज्य के स्वामी थे, अब क्षण में केवल ज्ञान साम्राज्य के स्वामी हो गये । बत्तीस इन्द्रों ने भगवान भरत की पूजा की, मोक्ष मार्ग के दीपक केवली भरत ने बहुत समय तक इस पृथ्वी पर विहार कर कैलाश पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। निर्धारण दीक्षा लेने के अल्पकाल के पश्चात् उन्होंने सर्वज्ञता प्राप्त करने में सभी तीर्थंकरों की अपेक्षा अंदद्भुत विशेषता प्रदर्शित की। हरिवंशपुराण में भरत मुनिराज के विषय में ये पद्य महत्वपूर्ण हैं ।
पंचमुष्टिभिस्पाट्य ट्यत्बंधस्थितिः कयात् । लोचानन्तपमेवापद राजन श्रेणिक! केवलम् ।।१६१७॥ द्वात्रिशनिवशेन्द्रः स, कृतकेवलपूजनः । दीपको मोक्षमार्गस्य, विजहार चिरं महीं ॥१६१८।। प्रश्न :-हुंडाक्सपिरणी काल की अद्भुत घटनाएँ कौनसी हैं ?
उत्तर :- सप्त परम स्थानों में प्रतिपादित साम्राज्य पदवी के स्वामी होते हुए भी चक्रवर्ती भरतेश्वर का बाहुबलि स्वामी द्वारा पराजय होना आश्चर्य की वस्तु लगती है, किन्तु आगम में बताया है कि असंख्यात उत्सपिरणी अवसर्पिणी के पश्चात्