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[ गो. प्र. चिन्तामरिण कि सारा संसार स्वार्थी है । अपनी प्रशस्ति में चक्रवर्ती ने लिखा था :-~
नप्ता श्री नाभिराजस्य पुत्रः श्रीवृषभेशिनः । षट् खंडमंडितामेनां यः स्म शास्त्यलिलां महीं ॥१६१२॥
जो नाभिराज का पौत्र है, श्री वृषभदेव का पुत्र है, जिस भरत ने छह खंडों से सुशोभित इस समस्त पृथ्वी का पालन किया है ।।
भत्वाऽसौ गत्वरी लक्ष्मी जित्वरः सर्वभूभृतां । जगद्विसत्यरी कोतिमतिष्ठिपदिहाचले ॥१६१३॥
जो समस्त राजनों की जीतने वाला है, ऐसे मुझ भरत ने लक्ष्मी को चंचल . समझकर विश्व में फोलने वाली कीर्ति को इस पर्वत पर स्थापित किया ।
इस प्रकार चक्रवर्ती ने अपना यश फैलाने वाली प्रशस्ति स्वयं अपने अक्षरों से लिखी थी, उस समय देवों ने चक्रवर्ती पर पुण्य वर्षा की थी । आकाश में दुन्दुभि बजी थी तथा देवताओं ने जय-जयकार किया था ।
इस वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस जगत में अमरिणत प्रतापी और पुण्यात्मा पुरुष हो चुके हैं। जिस तरह भरत महाराज ने एक चक्रवती का नाम अलग कर अपनी गौरव पूर्ण प्रशस्ति लिखी है । इस प्रकार भविष्य में कभी कोई चक्रवर्ती भरत महाराज का नाम भी मिटाये बिना न रहेगा । प्रत्येक जीव को मान कषाय छोड़कर मार्दव भाव को अपनाना चाहिए।
प्रश्न :- चक्रवतियों में भरतेश्वर का वैभव कैसा था ?
उत्तर :- व्यक्तिगत जीवन, परिवार प्रादि सब विशेष महत्त्वपूर्ण रहे हैं । प्रादिनाथ तीर्थकर के ज्येष्ठ पुत्र होने के साथ उनके द्वारा विद्या का अभ्यास करने का अद्भुत सौभाग्य था । इनके कुटुम्ब में अनेक व्यक्ति चरम शरीरी हुए हैं । आज जिन महावीर भगवान का भरत क्षेत्र में तीर्थ चल रहा है, उन वीर भगवान का जीव सम्राट भरत का पुत्र मरीचिकुमार के रूप में विद्यमान था । सम्राट के पुत्रों में विवर्धन आदि ६२३ राजकुमार अद्भुत चारित्र वाले थे। उन्होंने नित्य निगोद की अवस्था को छोड़कर कर्म भार हल्का होने से मनुष्य पर्याय प्राप्त की थी और आदिनाथ भगवान के समवशरण में धर्मोपदेश सुनकर रत्नश्रय से अलंकृत मुनि, पदवी को धारणकर अल्प समय में ही मोक्ष प्राप्त किता था । मूलाराधना टीका में इस विषय का इस प्रकार वर्णन किया गया है ।
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