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________________ अध्याय : नौवा ] [ ७८१ ७वां नरक गये सिध्द भये सुवर्णप्रभ भूवल्लभ ६. १०. पद्य महापा चित्रवाहन विमलवाहन अरिष्ट सेन धर्मसेन कीत्याँध १२. ७वां नरक गये प्रश्न :--भरतचक्रवर्ती का वृषभाचल पर अपनी प्रशस्ति लिखने पर विचार कैसे रहे ? उत्तर :--.-महान् पुण्यात्मा चक्रवर्ती भरत क्षेत्र के छह खण्डों पर विजय प्राप्त करता है । वह पांच म्लेच्छ खंडों की विजय के लिए विजयार्थ पर्वत की ओर गमन करता है। यहाँ के राजानों को जीतकर चक्रवर्ती हिमवान पर्वत के समीप प्राता है, और इसके निकटवर्ती वृषभाचल पर्वत के दर्शनार्थ जाता है। यह सौ योजन ऊंचा तथा सौ योजन चौड़ा है। इस मनोहर पर्वत की शिला पर प्रत्येक विजेता चक्रवर्ती अपने गौरव को सूचित करने वाली प्रशस्ति लिखता है । चक्रवर्ती भरत जब वृषभाचल पर्वत के निकट पहुंचे, तब उन्होंने क्या किया, इस विषय में महापुराण का वर्णन महत्त्वपूर्ण है ! जिनसेन स्वामी लिखते हैं, "समस्त पृथ्वी को जीतने वाले भरत चक्रवर्ती ने अपने हाथ में काकिणी रत्न लेकर अपना नाम उस पर्वत पर लिखने का विचार किया, उस समय भरतराज ने उस पर्वत पर हजारों चक्रवर्ती राजाओं के नाम लिखे देखे : तदा राजसहसाणां नामान्यवेक्षताधिराट् । (पर्व ३२-१४१) असंख्यात करोड़ कलदों में जितने चक्रवर्ती राजा हुये थे, उनके नामों से . भरे हुये उस पर्वत को देखकर भरतेश्वर को बहुत प्राश्चर्य हुआ। इसे देखकर चक्रवर्ती का गर्व दूर हुया और उन्होंने निश्चय किया कि इस भरत क्षेत्र में एक मैं ही शासक नहीं हूँ, मेरे समान अनेक चक्रवर्ती शासक हो चुके हैं। जिस समय भरतेश्वर ने एक चक्रवर्ती के नाम की प्रशस्ति मिटाई थी, उस समय उसने निश्चय किया
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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