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अध्याय : नौवां ।
[ ७६७ इस प्रकार ७ अजीव रत्न कहलाते हैं। इनमें एक से लेकर पांच तक अजीव रत्न अपने-अपने नगरों में उत्पन्न होते हैं और ६ और ७ विजयार्थ पर्वत में उत्पन्न होते हैं । नम्बर ८ से ११ तक प्रायुधशाला में उत्पन्न होते हैं । नम्बर १२ से १४ तक के रत्न श्री देवी के मन्दिर में उत्पन्न होते हैं। इन १४ महारत्नों में प्रत्येक रत्न का रक्षण एक-एक हजार यक्ष देवता किया करते हैं । चक्रवर्ती के स्वामित्व का स्वरूप --
चक्रवर्ती का ३२ हजार राजाओं पर स्वामित्व होता है । उन राजाओं के लक्षण निम्न प्रकार समझना चाहिये।
नृपति-जो समस्त नर अर्थात् मनुष्यों का रक्षण करने वाला हो, वही नृप या नृपति कहलाता है।
भूप- समस्त पृथ्वी का जो रक्षक हैं, वह भूप या भूपति कहलाता है।
राजा-~जो समस्त प्रजा जनों को राजी रखने काला है, वही राजा कहलाता है। इन राजानों के छह गुण होते हैं
१. संधि-मिलाप (अपसात), २. विग्रह -युद्ध, ३. यान:- वाहन, ४. प्रासनमुक्काम, ५. संस्थान - वचनों की दृढ़ता (वाचनिक), ६.. पाश्रय = आधार इसके दो भेद होते है, जो अपने से प्रवल रहे उसका प्राश्रय लेना, और जो अपने प्राधीन रहे उसे आश्रय देना अति शरणागतों का प्रतिपालन करना । यही राजा के छह गुरग समझना चाहिये। राजाओं के कर्तव्य कर्म
१. प्रात्मपालन करना-अर्थात् राज्य करने वालों को प्रथम अपनी आत्मा का पालन करना चाहिये । अर्थात् स्वतः के प्रारी का रक्षा करना चाहिये ।
२. मतिपालन करना-अर्थात् अपनी बुद्धि निर्मल रखनी चाहिये । ३. कुल पालन करना--अर्थात् राजकुलाचारादि संभावना चाहिये ।
४ प्रजा-पालन करना- अर्थात् पुत्र के समान प्रजाजनों की रक्षा करनी चाहिये ।
शिष्टों का संरक्षण और दुष्टों का निग्रह करना चाहिये।