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________________ कोई कोई कहते है कि हम तो तीर्थों पर स्नान करके अथवा और कोई पुण्य कार्य करके इन व्यसनों से उत्पन्न हुए पापों को धो डालते हैं, सो उनका यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि इसका उत्तर पहले अनेक श्लोकों का प्रमाण देकर अच्छी तरह बतला चुके हैं। प्रसंगानुसार थोड़ा सा यहां भी लिखते हैं। भारत में लिखा है-- मदो भार सहस्त्रेण जलकुम्भ शतेन च । न शुद्धन्ति दुराचाराः तीर्थस्नान शतैरपि ॥२०४३।। काम रागमदोन्मसाः स्त्रीणां ये वशतिनः । न ते जलेन शुद्धयन्ति स्नाम तीर्थ शतैरपि ॥२०४४॥ अर्थ:----जो पुरुष दुराचारी है, वह अपनी शुद्धता के लिए यदि हजार भार प्रमाण मिट्टी अपने हाथ-पैर आदि सारे शरीर पे लगाये और फिर मंगा, यमुना, सरस्वती प्रादि नदियों के पवित्र जल के सैकड़ों घड़े भरकर स्नान करे, तो भी वह शुद्ध नहीं होता। दुराचारी सैकड़ों तीर्थ स्नानों से भी शुद्ध नहीं हो सकते । इसी प्रकार जो लोग काम के राम से मदोन्मत्त हो रहे हैं और जो सदा स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं, वे पुरुष न तो जल से ही शुद्ध होते हैं और न सैकड़ों तीर्थ स्नानों से मुंद्ध होते हैं । दुराचारी लोगों को ऐसा ही महापाप लगता है, जो तीर्थों के स्नान से भी नहीं छूट सकता । फिर भला वह पाप दूसरी जगह कहां छूट सकता है ? अर्थात् वह पाप कहीं नहीं छूट सकता। शारंगधर संहिता में लिखा है-- .. कर्षाभ्यामर्द्ध पसं ज्ञेयं सुक्तिरष्टमिका तथा । सूक्तिभ्यां च पलं ज्ञेयं मुष्टिरानं चतुथिका ॥२०४५।। दश मासे का एक कर्ष होता है। लिखा भी है.---"कर्षस्तु दशमासकः", दो कर्ष का एक पैसा होता है । दो पैसे का एक टका होता है। यहां टका कहने से टका भर तौल समझना चाहिये । इस प्रकार चालीस मासे का एक टका भर तौल समझना चाहिये । प्रागे उसी शारंगधर में लिखा है पलानां द्विसहस्त्रं तु भारः एकः प्रकीर्तितः । अर्थात् ---दो हजार पलों का एक भार होता है। इस प्रकार के एक हजार भार मिट्टी से तथा गंगा आदि तीर्थों के सैकड़ों घड़े जल से भी मांसाहारी कभी शुद्ध नहीं हो सकता । यही बात पहले पर्व में लिखी है TEAC ESST
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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