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[ गो. प्र. चिन्तामणि विसं रागादिसक्लिष्टमलोक बचनै मुखम् । जीवं हिंसाभिः कायोयं गंगा तस्य परान्सुखी ॥२०४६॥
अर्थ :--जिसका चित्त राग, द्वेष, मोह, मद, काम आदि से मलीन है, मुख मिथ्या वचनों से झूठ बोलने से मलीन है और जीवों की हिंसा करने से जिसका शरीर मलीन है। उसके लिए गंगा भी प्रतिकूल हो जाती है । मंगा ऐसे पुरुषों के सन्मुख कभी नहीं हो सकती। ऐसे पापियों को नहीं मिल सकती अर्थात् ऐसे पापियों के पाप तीर्थों में भी कट नहीं सकते ।
कोई-कोई तीर्थों में स्नान करने मात्र से ही समस्त पापों का छुट जाना मानते हैं तथा शुभ गतियों का होना मानते हैं, सो भी ठीक नहीं है । क्योंकि यदि तीर्थों में स्नान करने मात्र से जीव तिर जाय, पापों से छूट जाए, तो फिर गंगा आदि तीर्थों के जल में रहने वाले मछली, मेढक, मगरमच्छ, कछुवा आदि जलचर जीव सब । ही मुक्त हो जाना चाहिये। सब ही के पाप छूट जाना चाहिये । परन्तु ऐसा होता नहीं है । लिखा भी है... . . यद्यबुस्नानतो देही कृतपापाद्विमुच्यते । ... मुक्ति यांति सदा सर्वे जीवास्तोयसमुद्भवाः ॥२०४७॥
__ वेद व्यास ने अठारह पुराण बनाये हैं। परन्तु उन सबका सार केवल दो वचनों में लिखा है । जीवों को अभयदान देने से तथा अन्य प्रकार से पर जीवों का उपकार करने से पुण्य होता है तथा अन्य जीवों को पीड़ा देने से पाप होता है । बस सब पुराणों में ये ही दो वचन सार हैं और बाकी सब निःसार हैं। सो ही लिखा है--
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।..' परोपकारः पुण्याय पापाय परपीड़नम् ।।२०४८॥
• इस प्रकार और भी अनेक पुराणों में जीवों की हिंसा करने में और मांस भक्षा करने में अनेक दोष बतलाये हैं। तथा स्थान-स्थान पर इनके त्याग करने का उपदेश दिया है। इसलिए सत्पुरुषों को इन दोनों का त्याग कर देना ही उचित है। जो निर्दयी, शूद्रों के समान विषयों के लंपटी, महापापों के द्वारा अधोगति को जाने वाले धमों का नाश करने वाले और पापों को बढ़ाने वाले लोग अनेक प्रकार की बात बनाकर जीव हिंसा करने मांस भक्षण करने, मद्य पान करने, शहद खाने तथा
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