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अध्याय: दसवां ]
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और भी महापापों का श्राचरण करने में ग्रानन्द मानते हैं और धर्म की हंसी करते हैं, वे महा अशुभ कर्मों का बंध कर नरकादि कुगतियों में चिरकाल तक परिभ्रमण करते रहते हैं ।
प्रश्न : --- मुनिराज पोंछी रखते हैं सो उसमें ऐसा कौन सा गुरण है, जो वे सामयिक, वंदना देव दर्शन करने में चलते बैठते सब कामों में उसको अपने पास रखते हैं। तथा उसके वियोग में प्रायश्चित लेते हैं, सो क्या बात है ?
उत्तर :- पोंछी में पांच गुण होने चाहिए। जो धूल और पसीने को दूर करे, जो कोमल हो, जो चिकनी हो और जो छोटी वा हल्की हो। ये पांच गुण पीछी में होने चाहिये। ऐसी पींछी से जीवों को अभयदान मिलता है । यह उसमें सबसे उत्तम गुण है । ऐसा भगवान अरहंत देव ने कहा है । यदि पीछी न हो तो साधु जनों की ईर्ष्या समिति का नाश हो जाता है। तथा स्थूल सूक्ष्म यादि अनेक जीवों का घात होता है। जिससे उन मुनियों का मुनि पद ही भ्रष्ट हो जाता है। इसीलिए पछी के वियोग में मुनिराज प्रायश्चित लेते हैं, सो ही सकलकीर्ति धर्मप्रश्नोत्तर में लिखा है
अथ पिच्छिका गुणाः रजः स्वेदाग्रहणद्वयम् ।
मार्दवं सुकुमालत्वं लघुत्वं सद्गुणा इमे ॥२०४६ ॥ पंज ज्ञेयास्तथा मेया निर्भयादि गुणोत्तमाः । मयूरपिच्छ जाताया: पिच्छिकाया जिनोदिताः ॥३२०५०।। समितिस्तां विना नश्येत्साधूनां कार्य साधने । स्थूल सूक्ष्मादि हिंसाद्या व्यर्थ जन्मदोक्षणम् ॥३२०५१
इस पंचमकाल के दोष से कितने ही ऐसे मुनि बन गये हैं, जो पींछी नहीं रखते और अपने को मुनि मानते हैं, परन्तु वास्तव में वे मुनि नहीं हैं। शास्त्रों में उनको जैनाभासी (जैनी तो नहीं है, परन्तु जैनियों के समान दिखाई पड़ते हैं ) बतलाया है । सो ही नीतिसार में लिखा है
कियत्यापि गते काले ततः श्वेताम्बरोऽभवत् । द्राविडो यापनीयश्च केकीसंघश्च मानसः ॥२०५२।।
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