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अध्याय : पाठवां ]
[ ५६१ योजन क्षेत्र में जितने प्रदेश होते हैं, उतने प्रशारण रहा है, अत समूच्र्छन जन्म वाले लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का भी यही प्रमाण है। . ..
- दृष्टि अगोचर ये सूक्ष्म लध्यपर्याप्तक मनुष्य कर्मभूमिज स्त्रियों की नाभि, योनि, स्तन और कांख में स्वभावतः उत्पन्न होते हैं ।
इंन अपर्याप्तक मनुष्यों के अवशेष गर्भज मनुष्य पर्याप्त ही होते हैं, अपर्याप्तक नहीं । अब अागमानुसार देवगति में अल्पबहुत्व कहते हैं । देवगति की अपेक्षा अल्पबहुब
विमानवासिनः स्तोकादेवा बेच्यो भवन्ति । 'सेभ्योऽसंख्य गुरसाः सन्ति दशधा भावनामराः ।।१४६६।। तेभ्योऽसंख्यगुणा देवा व्यन्तरा अष्टधा मताः । तेभ्यः पञ्चविधा ज्योलिष्काः संख्यातगुणाः स्मृताः ||१४७०।। . . .
देवगति में विमानवासी देय देवियों का प्रमाण सर्वस्तोक है । विमानवासी देवों के प्रकार से दश प्रकाश के भवनवासी देवों का प्रमाण असंख्यात गुरगा है । भवनवासी देवों से प्राट प्रकार के अन्तर देवों का प्रमाण असंख्यात गुरगा है । और व्यन्तर देवों से पांच प्रकार के ज्योतिषी देवों का प्रमाण संख्यात गुरगी है। देवों का भिन्न-भिन्न अल्पमहत्व-- . .
देवगति गत सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र देय सबसे स्तीक हैं। इनसे विजय, बंजयन्त, जयन्त और अपराजित में तथा नवोत्तर विमानों में स्थित सर्व अहमिन्द्र देव असंख्यात गुगणे अर्थात् पल्यापम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। इनसे नववेयक, मानत, प्रानत, पारणं और अच्युत स्वर्गों के देव संस्थात गुरणे अर्थात् पल्योपम के असंख्यात भाग प्रमाण हैं । इनसे शतार-सहस्त्रार स्वर्ग के देव असंख्यात गुरणे अर्थात् श्रेयो के चतुर्थ वर्गमूल का श्रेणी में भाग देने पर जो लब्ध्य प्राप्त हों उसके एक भाग प्रमाण हैं । इनसे शुक्र-महाशंक कल्प के देव असंख्यात गुणे अर्थात् श्रेणी के पंचम वर्गमूल से भाजित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं। इनसे लान्तव, कापिष्ट कल्प के देव असंख्यात गुरणे अर्थात् श्रेणी के सप्तम वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं । इनसे ब्रह्म अह्मोतर कल्प के देव श्रेणी के नवम वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भार प्रभारस हैं । इनसे सानत्कुमार-महेन्द्रः कल्प के देव असंख्यात गुरणे अर्थात् श्रेणी के ग्यारहवें वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग. प्रमहरा हैं । इनसे सौधर्मेशान
Padurintenamentatio