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________________ ५६२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि कल्प के देवों का प्रमाण असंख्यात गुणा है । सौधर्म स्वर्ग से सर्वार्थसिद्धि पर्यंत के सर्वविमानवासी देव असंख्यात श्रेणी प्रमाण है । अर्थात् धनांगुल के तृतीय वर्गमूल से कुछ अधिक प्रमाण श्रेणियां हैं । इनसे असंख्यात गुणे दश प्रकार के भवनवासी देव हैं, जो असंख्यात श्रेणी प्रमाण अर्थात् धनांगुल के प्रथम वर्गमूल का जितना प्रमारण है, उतनी श्रेणियों के प्रमाण हैं । इनसे असंख्यात गुरमे पाठ प्रकार के व्यन्तर देव हैं, वे जगप्प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थात संख्यात प्रतरांगलों से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतनी श्रेणिया प्रमाण है । इनसे संख्यात गुरणे पांच प्रकार के ज्योतिषी देव हैं। वे ज्योतिष देव जगत्प्रतर के असंख्यात भाग प्रमाण हैं । अर्थात् पूर्वोक्त. संख्यात प्रतरांगुलों से संख्यातगुण हीन प्रतरांगुलों द्वारा श्रेणी को खण्डित करने पर जो प्रमासा प्राधे उतनी नोगियां हैं। जीवों को पर्याप्तियां और प्रारणों का कथन- : आहारोऽय शरीरं चेन्द्रियान प्रारा संज्ञको । भाषा मम इमाः षट्स्युः पर्याप्तयोऽत्र संझिनाम् ॥१४७१॥ असंक्षि विकलाक्षाणां स्थुस्ताः पञ्च मनो विना । एकाक्षाणां चतस्त्रश्च पर्याप्तयों वो विना ॥१४७२॥ पञ्चेन्नियाह बयाः प्राणा मनोवाक्काय जास्त्रयः । पान प्रारणास्तयायुश्वामी प्रारणा वश संजिनाम् ।।१४७३॥ असंझिनां नव प्रारणास्ते भवन्ति मानो विना । चतुरिन्द्रियजीवानामष्टौ श्रोत्रं विनापरे ॥१४७४॥ श्रीन्द्रियाणां च ते प्रारणाः सप्त चक्षुविना स्मृताः । द्वीन्द्रियाणां च षट् प्रारणाः सन्ति घाणेन्द्रियं विना ॥१४७५।। पृथिव्यादि वनस्पत्यन्त यवस्थावरात्मनाम् । एकाक्षारसां चतुः प्रारणा रसना बचोऽतिगाः ॥१४७६॥ पञ्चेन्द्रियाहयाः प्रारणा प्रायः शरीरमित्यमी । सप्तप्राणा अपर्याप्तसंजि पञ्चाक्षजन्मिनाम् ॥१४७७॥ पञ्चाक्षायुः शरीराल्याः प्राणाः सप्त भवन्ति । अजिनाम पर्याप्त पञ्चेन्द्रियात्त देहिनाम् ।।१४७८।। पक्ष
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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