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________________ प्रध्याय : आठवां } [ ५६३ चत्वार इन्द्रियः प्राणा प्रायः काय इसे मताः ।। प्राणाः षट् भुध्धपर्याप्त चतुरिन्द्रिय अम्मिनाम् ।।१४७६॥ स्पर्शाक्षरसन घारणाक्षायुः काया अपीत्यमी।। प्राणाः पञ्चह्मपर्याप्त श्रीन्द्रिया मुमतां स्मृताः ॥१४८०॥ स्पर्श जिह्वाक्ष कायायुः प्राणाश्चत्वार एव हि । प्रागमे कीर्तिता हीन्द्रिया पर्याप्ताङ्गिनां जिनः ।।१४०१॥ स्पर्शन्द्रिय शरीरायुः प्राणास्त्रयो मता जिनः । अपर्याप्त पृथिव्यादि पञ्चस्थावर जन्मिनाम् ॥१४८२॥ ग्रहीत पाहार वर्गणा को खल रस. अदि रूप परिमाने की जीव की शक्ति के पूर्ण होने को पर्याप्ति कहते हैं। आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन इस प्रकार पर्याप्ति के छह भेद हैं । संशी पंचेन्द्रिय जीयों के छहों पर्याप्तियाँ होती हैं। असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के और विकलेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय जीवों के मन पर्याप्ति के बिना.. पाँच तथा एकेन्द्रिय जीवों के मन और वचन के बिना चार पर्याप्तियाँ होती हैं। : प्रारण :-- (जिनके सद्भाव में जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार हो, उन्हें प्रारण कहते हैं ) । पांच. इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, प्राग, चक्षु कर्ण) प्राग मनोबल, वचन बल और काय बल के भेद से तीन बल प्राण एक श्वासोच्छवास और एक प्रायु, इस प्रकार दश प्राण होते हैं। असंही पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के मनोबल को छोड़कर, शेष नव प्रारण होते हैं, चतुरिन्द्रिय जीवों के श्रोत्रेन्द्रिय को छोड़कर आठ प्रारण, श्रीन्द्रिय जीवों के चक्षु को छोड़कर, सात प्राण और द्वीन्द्रिय जीवों के प्रारणेन्द्रिय को छोड़कर शेष छह प्राण होते हैं। पृथिवी कायिक से लेकर बनस्पति कायिक पर्यन्त, पांचों स्थावर जीवों के रसनेन्द्रिय और वचनबस को छोड़कर शेष चार प्रारण होते हैं । संज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों के पांच इन्द्रियां कायबल. और आयु. इस प्रकार सात प्राण होते हैं । असंही पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों के पांच इन्द्रियां; कायबल और आयु ये ही सात प्रारण होते हैं। अपर्याप्तक चतुरिन्द्रिय जीवों के चार इन्द्रियां, आयु और काय बल ये छह प्राण होते
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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