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[ गोः प्र. चिन्तामणि
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है। अपर्याप्तक त्रीन्द्रिय जीवों के स्पर्शन, रसना और धारण ये तीन इन्द्रियां, पायु और कायबल, ये पांच प्रारण होते हैं । जिनेन्द्रों के द्वारा आगम में अपर्याप्तक द्वीन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय आयु और कायबल, ये चार प्रारण कहे गये है । जिनेन्द्र के द्वारा स्पर्शनेन्द्रिय, कायबल और आयु. ये तीन प्रारण अपर्याप्तक पृथिवी
आदि पांच स्थावर जीवों के कहे गये हैं। . . . . . . . जीवों को गति-पाति का प्रतिपादन--
ये पृथ्वीकायिकाकालिका वनस्पति देहितः । द्वि वितुर्याक्ष पश्चाक्षा लब्ध्य पर्याप्त काश्च ये ॥१४६३॥ पृथ्वमादिक वनस्पत्यन्ताः सूक्ष्माः निखिलाश्च ये।। जीवाः पर्याप्त का पर्याप्ताप्ते जीवायुकायिकाः ॥१४८४॥ सूक्ष्म बादर पर्याप्ता पर्याप्ताः सकलाश्च ते । असजिनश्च सर्वेषां तेषां मध्ये विधेर्थशात् ॥१४८५३॥ उत्पद्यन्ते व्रतातीता स्तिर्यञ्चो मानवाः अधात् । तस्मिन्नेव भवे मृत्वा स्वार्तध्यानकुलेश्यया ॥१४८६॥ पृथ्वोकायास्तथाप्कायिका वनस्पतिकायिकाः ।। सूक्ष्म बादर पर्याप्त पर्याप्ता विकलेन्द्रियाः ॥१४८७॥ एते कर्म लघुत्वेन जायन्ते तद्भवे मृताः । . मृतियम्भवयोर्मध्ये काललध्या न संशयः ॥१४८८।। सूक्ष्म दादर पर्याप्सा पर्याप्तनलकायिकाः । सूक्ष्म बादर पर्याप्तापर्याप्तवायुकायिकाः ॥१४८६।। न लभ्यस्ते मनुष्यस्व मूत्वा सस्मिन् भवे क्वचित् । किन्त्वेते केवलं तिर्यग्योनि यान्ति कुकर्मभिः ॥१४६०॥ प्रत्येकाख्य वनस्पत्यनिषु पृथ्व्यम्बुयोनिषु ।. बादरेषु च पर्याप्तेषु जायन्ते विधेशात ॥१४६१॥ प्राध्यानेन दुर्मुत्यु प्राप्य संक्लिष्ट मानसाः। . तिर्यञ्चो मानवा देवास्तस्मिरभवे प्रतातिगाः ।।१४६२॥ नृगतौ भौगभूम्यादि जिताया. सुरेषु च । भावन व्यन्तर ज्योतिकजेः . नरकादिमे ॥१४६३॥, ... ... ... ...