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________________ अध्याय : आठवां ] : - कर्म भूमिजतिर्यग्योनिषु सर्वासु तद्भवे । . . तिर्यश्चोऽसंज्ञि पर्याप्ता उत्पद्यन्ते स्वकर्मणा ॥१४६४॥ "तिर्यचो. मानवा भोगभूजास्तभोगजास्तथा । यान्ति देवालयं सर्वे नूनं मन्द कषायिणः ॥१४६५॥ -पृथिवीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इन लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में पर्याप्त एवं अपर्याप्तक सूक्ष्मकाय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिकायिक जीवों में समस्त अग्नि कायिक, वायु कायिक जीवों में तथा सम्पुर्ण असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक अपर्याप्तक जीवों में पाप कर्म के वशीभूत होते हुए व्रत रहित तिर्यञ्च और मनुष्य उत्पन्न होते हैं, तथा अार्तध्यान एवं कुलेश्याओं से युक्त सूक्ष्म-बादर पर्याप्तक और अपर्याप्तक पृथिवी कायिक, जल कायिक, वनस्पतिकायिक जीव एवं पर्याप्तक अपर्याप्तक विकलेन्द्रिय जीव इन पर्यायों से मरकर कर्मों के कुछ मंदोदय से एवं काललब्धि से मनुष्यों तथा तिर्यञ्चों में उत्पन्न होते है । सूक्ष्म, बादर, पर्याप्तक और अपर्याप्तक अग्नि कायिक जीव तथा सूक्ष्म-बादर पर्याप्तक और अपर्याप्तक वायू कायिक जीव इन भवों से मरकर. कभी भी मनुष्य पर्याय प्राप्त नहीं करते, दुष्कर्मों के कारण मात्र तिर्यञ्च योनियों में ही उत्पन्न होते हैं । संक्लेश परिणामों से युक्त तथा व्रत रहित तिर्यञ्च, मनुष्य और देव आर्तध्यान एवं कर्मोदय के वश से दुर्भृत्यु को प्राप्त होकर बादर पर्याप्तक पृथिवीकायिक, जलकायिक और प्रत्येक वनस्पति कायिक जीवों में उत्पन्न होते हैं। अपने कर्मों के वशीभूत होते हुए, असंज्ञी पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च भरकर भोग भूमिज मनुष्यों को छोड़कर मनुष्य गति में, भवन वासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिष्क रूप देवगति में, प्रथम नरक में तथा कर्मभूमिज तिर्यञ्च योनि में उत्पन्न होते हैं। भोग भूमिज तिर्यञ्च और मनुष्य नियम से देवों में ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे स्वभाव से मन्दकषायी होते हैं। 'धर्म प्राप्ति के लिए जोष रक्षा का उपदेश इति विविध सुभेदैर्जीवयोनीविदित्वा, गतिकुलवपुरायुः स्थान · संख्याधनेकैः । स्वपरहित वृषाप्त्यै प्रोदिता ज्ञान दृष्टया, - सुचरणं शिव कामाः स्वात्मवत्पालयन्तु ॥१४६६॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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