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{ गो. प्र. चिन्तामगिए ___ इस प्रकार उत्तम चारित्र के साथ-साथ मोक्ष की इच्छा करने वाले सज्जन पुरुषों को स्वपर हितकारी धर्म की प्राप्ति के लिए जीवों की गति, कुल, शरीर, आयु, संस्थान और संख्या आदि के द्वारा नाना प्रकार के भेदों को ज्ञान चक्षु से भली प्रकार जानकर अपनी आत्मा के सदृश ही जीवों की रक्षा करना चाहिये ।
...... (सिद्धान्त सार दीपक, सकल कीति प्राचार्य) प्रश्न :- उद्वेलना और विसंघोजना में क्या अन्सर है ?
उत्तर :-मूल प्रकृति की उद्वेलना और विसंयोजना होती नहीं है, उत्तरप्रकृति अपने रूप खिरती नहीं है, पर प्रकृति में मिलकर खिर जाती है, फिर सत्ता में नहीं रहती हैं, उसे उद्धलना कहते हैं। और हो तर प्रकृति अपनी जातीय प्रकृति में मिल जाती है, उसे विसयोजना कहते हैं । उद्धारण, जैसे अनंतानुबंधी अप्रत्याख्यानावरण में । यहां विशेष इतता समझना--उद्वेलन की हुई प्रकृति, फिर से बन्ध किये बिना उदय में नहीं पाती है । और विसंयोजना वाली उदय में आती है।
प्रश्नः --अन्तमुहर्त के कितने भेद हैं ?
उत्तर :- एक प्रावली एक समय को जघन्य अन्तर्मुहूर्त कहते हैं । एक समय कम मुहूर्त को उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त कहते हैं तथा भिन्न मुहूर्त कहते हैं-~-मध्य के असंख्यात भेद हैं। .. प्रश्न: ---प्राबलो का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :---एक मुहूर्त के सैतीस सौ तिहत्तर स्वासोच्छवास होते हैं । एक स्वासोच्छवास में कोडा कोडी प्रावली से कुछ अधिक ही होती है। यहां कोई कहता है कि हम तो अंगुली के आवर्त को आवलि जानते हैं, सो उपरोक्त काल तो बहुत थोड़ा हुआ । उसका समाधान करते हैं । प्रावलि असंख समया संखेज्जावलिहवेइ उस्सासो।
गोमट सार जीव कांड, गा. २१, प्रश्न :- सम्यग्दृष्टि प्रादि परस्पर असंख्यात गुणी अधिक निजरा वाले कहे हैं, सो उनका स्वरूप क्या है ?
उत्तर :----सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्त वियोजक, दर्शन मोह,,क्षपक उपशमक, उपशांतमोह. क्षायिक, क्षीणमोह, जिन ये दशविध के पुरुष जानने । प्रथम ही प्रथमोपशम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के पहले करात्रय के परिणाम के चरम समयवर्ती
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