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________________ अध्याय : पाठवा ] [ ५६५ विशुद्धि विशिष्ट मिथ्यादृष्टि के जो निर्जरा होती है, उससे असंख्यात् गुणी निर्जरा शौथे गुणस्थान वाले अविरत सम्यग्दष्टि के होती है। ऐसे ही क्रमशः एक से आगे एक की असंख्यात गुणी निर्जरा होती है। . .. प्रश्न :-- केवलि समुद्घात के पाठ समय हैं, उनमें त्रस नाडी के बाहिर जीव के प्रदेश कौन से समय में होते हैं ? उत्तर :--तेरहवें-गुणस्थान के अन्त में प्रात्मप्रदेश की प्रसरण संवररण रूप क्रिया पाठ समय के अन्दर होती है, वहां केवलो जो कायोत्सर्गासन सहित होता है, तो बारह अंगुल प्रमाण समवृत अथवा मूल शरीर प्रमाण समवृत्त उपविष्ट होता है, तो मूल शरोर ते त्रिमुरो मोटाई सहित तीनों वातवलय हीन लोक नाड़ी प्रमाण उर्दू दंडाकार प्रात्म प्रदेश प्रथम समय में करें । यहाँ प्रदेश अस नाडी के बाहर नहीं गये, तदनन्तर जो केवल पूर्व मुख होंगे तो दक्षिणोत्तर में वालवलय हीन चौदह राजू ऊर्द्धलोक के अन्त तक विस्तीर्ण, दण्ड प्रमाण दल संयुक्त और उत्तर मुख होंगे तो पूर्व पश्चिम में बातवलय हीन चौदह राजू ऊर्द्ध लोक के अन्त तक विस्तीर्ण दंड प्रमाण दल संयुक्त पात्म प्रदेश को कपाटाकार दुसरे समय करते हैं। यहाँ लोक नाड़ी के बाहर आत्म प्रदेश गए । तदन्तर वातवलय के समस्त लोक व्यापि आत्मप्रदेशनिको, प्रतर, अपर समस्थान नाम समुद्धात करते हैं । यह प्राकार तीसरे समय में करता है, यहां आत्म प्रदेश बाहर गये । तदनन्तर वातवलय समेत सम्पूर्ण लोक व्यापी आत्मप्रदेशों को लोकपूर्ण रूप चौथे समय में करता है । यहा भी प्रारम प्रदेश बाहर गये । ऐसे चार समय के अन्दर प्रदेश फैलते हैं, और च्यार समय में ही संकोचते हैं। पहले समय में लोक पूर्ण संकोचते हैं। दूसरे समय में प्रतर रूप, तीसरे समय के कपाट रूप, चौथे समय में दंड के रूप, वहां दण्ड के प्रसरण और संवरण रूप में दो समय औदारिक योग है । औदारिक शरीर योग पुद्गल का ग्रहण करता है । कपाट के प्रसरण संवरण के अन्दर प्रत्येक संवरण में तीन समय औदारिक मिथ योग है । वहां औदारिक मिश्र शरीर योग्य पुद्गल का ग्रहण करता है । प्रतर के प्रसरण में लोक पूरण के प्रसरण संवरण में तोन समय कारिणयोग है। यहां कोई भी जो कर्म संबंधी पुद्गल का ग्रहण नहीं है, इसीलिए ये अनाहारक है । इस प्रकार पाठ समय में केवल समुद्घात का वर्णन किया । . . . . ......
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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