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________________ H ५६० ] [ गो. प्र. चिन्तामणि तेभ्यो मत्यश्चि संख्यातगुणाधिका जिनैः स्मृताः । हरि रम्यक वर्षेषु द्विपञ्चसु सुभोगिनः ॥ १४६१॥ तेभ्य श्रार्याश्च संख्यातगुणा दशसु सन्ति ये । सु हैमयल हैरण्य वतान्त भोग भूमिषु ॥ १४६२ ॥ भर कर्म भूमिषु संख्यात गुणा नराः शुभाशुभाः १४६३॥ तेभ्यः पञ्चविदेहेषु संख्यात गुण मानवाः । यः सम्मुनोत्पन्ना श्रसंख्यातगुणा नराः ॥ १४६४॥ Hafta श्रसंख्यातैक भाग मात्रका अपि 1. स च श्ररसंख्यात आय प्राख्यात भागमे ।। १४६५ ।। असंख्य योजनः कोटि कोटि प्रदेश मात्रका: एते युध्यतिर मर्त्याः सम्मूर्छ नोभयाः ।। १४६६॥ नाभीस्तानान्तरे योनौ कक्षायां च निसर्गतः । सूक्ष्मा मरा इमे स्त्रीणां जायन्ते दृष्टयगोचराः ॥ १४६७।। शेषा ये गर्भजा मर्त्याः पर्याप्तास्ते न चेतरा: 1 ramat वक्ष्येऽल्प बहुत्वं जिनागमात् ॥ १४६८ ॥ मनुष्यगति में लवणोदधि और कालोदधि समुद्रों में स्थित ६६ अंपों के मनुष्यों का प्रमाण एकत्रित करने पर भी वे सर्व स्तोक हैं । तद्वीपों के मनुष्यों से पञ्चमे सम्बंधी दश उत्कृष्ट भोग भूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं । उत्कृष्ट भोगभूमियों के मनुष्यों से पञ्चमे सम्बंधी हरि- रम्यकः नामक दश मध्यम भोग भूमियों के मनुष्य सख्यात गुणे हैं । मध्यम भोग भूमियों से हैमवत हैरण्यवत नामक १० जघन्य भोग भूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं, और जन्व भोगभूमियों के प्रमाण से पञ्च भरत, पञ्च ऐरावत नामक दशकर्मभूमियों में शुभ-अशुभ कर्मों से युक्त मनुष्य संख्यातः गुरणे हैं । कुभूमिज मनुष्यों के प्रमाण से पंचविदेह क्षेत्रों में मनुष्य संख्यात गुणे हैं और विदेहस्थ मनुष्यों के प्रमाण से सम्मूर्च्छन मनुष्यों का प्रमाण असंख्यात गुणा है । जो श्रेणी के असंख्यात भागों में से एक भाग मात्र है । आगम में उस श्रेणी के प्रसंस्वातवें भाग का प्रमाण असंख्यात कोटा- कोटी
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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