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अध्याय : आठवां 1. वे संख्या में घनांगुल के वर्गमूल प्रमाण श्रेरिणयों के बराबर हैं, अर्थात् श्रेणी को धनांगुल के वर्गमूल से गुणित करने पर जो संख्या प्राप्त हो तत्प्रमाण (प्रथम पृथ्वी में नारकी) हैं। तिर्यञ्चति की अपेक्षा अल्पवहत्व
पञ्चेन्द्रिया हि तिर्यञ्चः सर्वस्सोका महीसले । " भवन्ति प्रतरासंख्यातभाग प्रमितास्ततः ॥१४५४॥ पञ्चाक्षेभ्यश्चतुर्याक्षाः स्युविशेषाधिका भुवि । " स्वकीय संश्य संख्यात भाग मात्रेण दु:खिनः ॥१४५५॥ तुर्याक्षेभ्यस्सथा द्वीन्द्रिया- विशेषाधिका मताः। . विशेषाः स्वस्थराशेश्वासंख्यातभाग मात्रकाः ॥१४५४॥ खोन्द्रियेभ्यस्तथा त्रीन्द्रिया विशेषाधिकाः स्मृताः । . विशेषः स्वस्वराशेरसंख्येय भाग मात्रकाः ॥१४५७।। श्रीन्द्रिपेश्यस्तथैकाक्षा अनन्सगुणसम्मिताः। अथ वक्ष्ये नरणां संख्याल्पबहुत्वं यथागमम् ॥१४५८॥
तिर्यञ्च राशि की अपेक्षा संसार में पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च जीव सर्व स्तोक अर्थात् प्रतर के असंख्यातवें भाम प्रमाण हैं। पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों से अत्यंत दुःख से युक्त चतुरिन्द्रिय जीव विशेष अधिक है। अर्थात् पंचेंद्रिय तिर्यञ्चों की राशि के असंख्यात भाग प्रमाण अधिक हैं। चरिद्रिय जीवों से द्वीन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं । वह विशेष का प्रमाण अपनी-अपनी राशि अर्थात् चतुरिन्द्रिय राशि का प्रसंख्यातवां भाग है। द्वीन्द्रिय जीव राशि से त्रीन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं । विशेष का प्रभारण अपनी-अपनी राशि अर्थात् द्वीन्द्रिय जीव राशि का असंख्यातवां भाग मात्र है । श्रीन्द्रिय जीव राशि के प्रमाण एकेन्द्रिय जीव राशि अनंतगुरणी अधिक है। अब मैं आगम के अनुसार मनुष्यों की संख्या का अल्पबहुत्व कहूँगा । मनुष्य गति में स्थित मनुष्यों का अल्पबहुत्थ
भवन्ति नृगतौ सर्वस्तोकाः संख्यासमानवाः । अन्तीपेषु विश्वेषु पिण्डितास्तेभ्य एव च ॥१४५६॥ अन्तर्वीप मनुष्येभ्यः संख्यातगुरण सम्मिताः । दशसूत्कृष्ट सद्भोग भूमिधु प्रधरा मराः ॥१४६०॥