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________________ WAN minuumaa-p-se- ५८८ ] [गो. प्र. चिन्तामरिण नरकगति की अपेक्षा अस्पबहुत्व-- . . • सप्तमे नरके सन्ति सस्तोकाश्च नारकाः । तभ्योऽपि नारकेभ्यः स्युरुपयु परियतिषु ।।१४५२॥ षट् पृथिवी नरकेष्वत्र नारकाः सुखदूरगाः । ... असंख्यात गुरणाः प्रत्येक दुःखाम्बुधि मध्यगाः ॥१४५३॥ सप्तम नरक में नारको जीव सबसे स्तोक हैं । सप्तम नरक से नारकियों से ऊपर ही छहों नरक पृथिवियों में दुःख रूपी समुद्र के मध्य डूबे हुए अत्यन्त दुःखी नारकी जीव असंख्यात गुख का गुसरे अधिक अधिक हैं । अर्थात् सप्तम नरक के नारकियों से छठवें नरक के नारकी असंख्यातगुरणे, छठवें से पांचवें में असंख्यात गुणे इत्यादि। प्रश्न:-उन्हीं सप्तम नरक में अलग-अलग व्यास की संख्या किस प्रकार है ? उत्तर :--अमीषा सप्त नरक पृथ्वीषु व्यासेन पृथक्-पृथक् संख्या निगद्यते । सप्तम पृथ्वी में नारकी जीव सबसे कम अर्थात् श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। (सात राजू की श्रेणी होती हैं) श्रेणी के दूसरे वर्गमूल से श्रेणी को भागित करने पर जो लब्ध प्राप्त होता है, उतने प्रमाण सप्तम. नरक के नारकी जीवों की संख्या है । सप्तम पृथ्वी से छठवी पृथ्वी में नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं । श्रेणी के तृतीय वर्गमूल से श्रेणी को अपहत (भागित) करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण नारकी जीव छठवीं पृथ्वी में हैं। छठवीं पृथ्वी से पांचवीं पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुरणे हैं। श्रेणी के छठवें वर्गमूल से श्रेणी को भागित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण पांचवें नरक के नारकी जीवों की संख्या हैं। पांचवीं पृथ्वी से चतुर्थ पृथ्वी में नारकी जीव असंख्यात् गुरगे हैं। श्रेणी के अष्टम वर्गमूल से श्रेणी को भाजित. करने पर जितना लब्ध प्राप्त होता है, उतने ही प्रभारण चतुर्थ पृथ्वी के नारकी जीवों का है। चतुर्थ पृथ्वी से तृतीय पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के दसवें वर्गमूल से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो, उतनी संख्या प्रमाण जीव तृतीय पृथ्वी में हैं । तृतीय पृथ्वी से द्वितीय पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के बारहवें वर्गमूल से श्वेणी को,भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण जीव द्वितीय पृथ्वी में हैं, वे श्रेणी के एक भाग प्रमाण प्राप्त होते हैं । द्वितीय से प्रथम पृथ्वी के नारंकी जीव असंख्यात गुरणे हैं,
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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