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________________ अध्याय आठवां ] [ ५८७ में अढ़ाई द्वीप स्थित छठवें गुणस्थान से १४ के गुण स्थान पर्यन्त के सर्व योगिराजों का योग करने पर सर्व तपोधनों का उत्कृष्ट प्रमाण ८६६६६६७ और तीन कम नौ करोड़ प्राप्त होता है । tara में ज्योतिष्क श्रौर व्यन्तर देवों का प्रमाण असंख्यात श्रेणी स्वरूप अंतर से असंख्यातवें भाग प्रभाग और भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात श्रेणी स्वरूप अर्थात् धनांगुल के प्रथम वर्गमूल प्रमाणं श्रेणी है । सोधर्मेशान स्वर्गो में मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात श्र ेणी स्वरूप अर्थात् घनांगुल के तृतीय वर्गमूल प्रमाण हैं। सनत्कुमारादि कल्पों में और कल्पातीत स्वर्गों में मिथ्यादृष्टि देवणी के प्रसंख्यातवें भाग अर्थात् असंख्यात योजन करोड़ क्षेत्र के जितने प्रदेश हैं उतनी संख्या प्रमाण है। ज्योतिष्कों व्यन्तरवासी देवों, सौधर्मेशान स्वर्गो, सानत्कुमारादि कल्पों और कल्पातीत विमानों में सासादन सम्यग्दृष्टि, सभ्यग्मिध्यावृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का प्रत्येक स्थानों में पृथक्-पृथक् प्रमाण पत्योपम के प्रसंख्यातवें भाग मात्र है ! जीवों के प्रमाण का अल्पबहुत्व तुतिषु संसारे मध्ये स्युः सकलाङ्गिनाम् । अत्यल्पा मानवाः श्रष्यसंख्येये भाग मात्रकाः ।। १४४६ ।। मनुष्येभ्योऽप्यसंख्यात गुणा तरक योनिषुः । नारकाः स्युरसंख्याताः श्र ेणयी दुःख विह्वला ॥१४४॥ नारकेभ्योऽप्यसंख्यातगुरया देवास्तुविधाः । भवन्ति प्रतरासंस्थेय भाग सम्मिताः शुभाः ।। १४५०॥ देवेभ्यः सिद्धनाथाः स्युरनन्त गुरुण मानका सिद्धभ्योऽखिल तिर्यञ्चः सन्त्यन्तगुरणप्रभाः ।।१४५१६ इस गति संसार में पचेंद्रिय जीवों में मनुष्य सबसे स्तोक है, इनका प्रमाण श्रेणी के प्रसंख्यातवें भाग मात्र है। नरक भूमियों में दुःख से विह्वल नारकी जीव मनुष्यों से असंख्यात गुणे हैं, जो असंख्यात श्रेणी प्रमाण है । नारकियों से श्रसंख्यातनिकाय के देव हैं, जो प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रभाग हैं। देवों से अनंतगुणे सिद्ध भगवान हैं, और सिद्धों से अनंत गुणे तिर्यञ्च जीव हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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