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________________ ५०६ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण विशेष है । परमागम में द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय एवं पंचेन्द्रिय जीवों का पृथक् पृथक प्रमाण प्रसंख्यात श्रेणी कहा गया है। र्थात् द्विन्द्रियं जीव श्रसंख्यात श्रेणी प्रमाण त्रीन्द्रिय जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण है । इत्यादि (परन्तु पूर्व पूर्व द्वीन्द्रियादिक की अपेक्षा उत्तरोत्तर श्रीन्द्रियादिक का प्रभाग क्रम से हीन है और इसका प्रतिभागहार आवलि का असंख्यातवां भाग है ) | असंख्यात श्रेणी का प्रमाण प्रतरांगुल का असंख्यातवां भाग माना गया है। अब में गुणस्थानों के माध्यम से नरकादि में उत्पन्न जीवों की संख्या कहूंगा । ra प्रत्येक गतियों के गुणस्थानों में जीवों का प्रभाग क्या है ? नरक गति गत प्रथम नरक में मिथ्यादृष्टि नारकी जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं, जो घनांगुल कुछ कम द्वितीय वर्ग मूल प्रमाण हैं । द्वितीय पृथिवी से सप्तम पृथिवी पर्यन्त के छह नरकों में मिथ्यादृष्टि जीव श्रेणी के प्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । सांतों नरक भूमियों में सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और संत सम्यग्दृष्टि जीवों का पृथक-पृथक प्रमाण पत्योपम के असंख्यातवें भाग है । तिर्यञ्चगति में मिथ्यादृष्टि जीव अनन्त हैं । सासादन: सम्यग्दृष्टि, सम्यस्मिथ्यादृष्टि असंयतसम्यग्दृष्टि और देश संयत जीव पृथक् पृथक् पत्योपम के प्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । मनुष्य गति में मिथ्यादृष्टि मनुष्य श्रेणी के श्रसंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । और वह श्रेणी का असंख्यातवां भाग श्रसंख्यात कोड़ा कोड़ी योजन प्रमाण हैं । सासादन गुणस्थानवर्ती जीव ५२ करोड़ प्रमाण हैं । तृतीय स्थानवर्ती सम्वर्गमथ्यादृष्टि मनुष्य १०४ करोड़ प्रमाण चतुर्थ गुणस्थान में अविरत सम्यन्दृष्टि मनुष्य ७०० करोड़ प्रमाण, पंचम गुणस्थान में देश संगत मनुष्य उत्कृष्टतः १३ करोड प्रमाण । प्रमत्त गुणस्थान में प्रमत्त संयत मुनिराज उत्कृष्टतः ५६३६८२०६ है । श्रप्रमत्त गुणस्थान में श्रप्रमत्तं संयत मुनिराज २६६६६१०३ हैं । अपूर्व करण गुणस्थान में उपशम श्रेणीगतं योगी २६६ हैं और क्षपक श्रेणीगत क्षपक जीव ५६८ हैं । अनवृत्तिकरण गुणस्थान में उपशम श्रेणिगत जीव २६६ और क्षपक श्रेणीगत ५६८ हैं । सूक्ष्म साम्पराय गुरुस्थान में उपशम श्रेणी प्रारोहित मुनिराज २६६ हैं और क्षति मुनिराज ५६८ हैं । उपशान्त कषाय गुणस्थान स्थित मुनिराजों का प्रमाण २६६ हैं तथा क्षीणकषाय गुणस्थान वर्ती योगियों का प्रमाण ५६८ है । संयोग गुणस्थान में सयोगिजनों की सर्वोत्कृष्ट संख्या प्रमाण ८५०२ हैं । tate गुणस्थान स्थित प्रयोगिजनों का प्रमाण उत्कृष्टतः २६ होता है। चतुर्थकाल
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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