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अध्याय : आठवां }
[ ५८५ पंचेन्द्रिय जीवों का सोनिय का विषय क्षेत्र ६.४५ अनुष, सन्द्रिय का ५१२ धनुष प्राणेन्द्रिय का ४०० धनुष, चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ५६०८ योजन और श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ८०० धनुष प्रमाण होता है । संजी पंचेन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र : योजन, रसनेन्द्रिय का ६ योजन, प्रारणेन्द्रिय का र योजन चक्षुरिन्द्रिय का विषय क्षेत्र ४७२६३ योजन १ कोस, १२१५ धनुष, १, १/४ हाथ २ अंमुल और १/४ यव प्रमाण है, तथा श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र । योजन १२ योजन प्रमाण है, चक्षुरिन्द्रिय अादि का यह उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ऋध्दिवान मुनिराजों एवं चक्रवर्तियों के ही होता है । . एकेन्द्रियादि जीवों की संख्या का प्रमाण----
प्रथकाक्षादि जीवानां प्रमाणं पृथगुच्यते । वनस्पती निकोतानिनोऽनन्सा प्रोदिता जिनः ॥१४४२॥ पृथ्वीकायिक . अप्कायिकास्तेजोमयाङ्गिनः ।.. वायुकाया इमे सर्वे प्रत्येक गदिता जिनः ॥१४४३॥ असंख्य लोकमानाचा संस्थलोकस्य सत्यपि । .. यावन्तोऽत्र प्रदेशास्तावन्मात्राः सूक्ष्मकायिकाः ॥१४४४॥ पुनस्ते । पृथिवीकायाचाश्चतुर्विध चादरः । पृथग् वासंख्य मात्रा अयं विशेषोऽस्ति चागमे ॥१४४५।। द्वोन्द्रियास्त्रीन्द्रियास्तुर्येन्द्रियाःपञ्धेन्द्रिया मताः । प्रत्येकं चाप्यसंख्याताः श्रेयः परमागमे ॥१४४६॥ प्रतराज गुलसंज्ञास्या संख्येयभाग सम्मिताः । .
अथ वक्ष्ये गुणस्थानः संख्याश्व भ्रादिजाङ्गिनाम् ॥१४४७॥
अब एकेन्द्रिय आदि जीवों का पृथक् प्रमाग कहते हैं । वनस्पतिकायिक जीवों में जिनेन्द्र भगवान् ने निगोद जीवों को अन्तानन्त कहा है। जिनेन्द्र देव के द्वारा बादर पृथ्वीकायिक, बादर अग्नि कायिक और बादर वायुकायिक जीव असंख्यात लोक मात्र अर्थात् असंख्याता संख्यात कहे गये हैं, और असंख्यात लोक के प्रदेशों का जितना प्रमाण है पृथक्-पृथक् उतने ही प्रमाण सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म जलकायिक सूक्ष्म अग्निकाचिक तथा सूक्ष्म वायु कायिक जीव कहे गये हैं । पुनः बादर पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक जीय पृथक्-पृथक. असंख्यात-असंख्यात ही हैं । प्रागम में
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