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________________ LE ५८४ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण प्रारणाख्य विषयश्चाप शतद्वय प्रमारकः । विषयश्चक्षुरसोत्थों दूरार्थदर्शकों भवेत् ।। १४३२॥ योजनः । चतुः पञ्चाशदर्य कोनशिल प्रसंज्ञि पञ्चखानां च विषयः स्पर्शनप्रजः ॥ १४३३॥ चापानां हि चतुः षष्टिः शतानि रसनाक्षम: 1 पञ्चशतानि च ।। १४३४।। faषयो धनुषां द्वादशाग्र विषयो प्राण रवोत्पन्नो धनुः- शत चतु प्रमः । क्षुरिन्द्रियजात विषयो रूपिदर्शक: ।। ९४३५ ॥ । प्रसः । योजनानां किलाष्टायें कोनषष्टि शत श्रोत्राक्ष fararaापाष्ट सहस्त्र प्रमाणकः ।।१४३६ ।। संज्ञि पंचेद्रियाणां व स्पर्शाक्षस्याखिलोतमः । रसनाक्षस्य हि घ्राणेन्द्रियस्य विषयो भुवि ।। १४३७ ।। प्रत्येकं वर्तते स्वस्वार्थे योजन नव प्रमः । सप्तचत्वारिशस्त्रिषष्ट्यधिके शते ।।१४३८॥ सहस्त्रा: द्व े महायोजनानां चेकक्रोशो धनुषा तथा । eos पञ्चदशाग्राणि द्वावशेष शतानि च ॥ १४३॥ हस्तेको यवतुर्याशार्थं द्वेऽङ गुलेऽखिलोसमाः । इस्यस्ति संशिनां चक्षुविषयो दूरदर्शकः ॥१४४० श्रोत्रस्य विषयो ज्येष्टो योजन द्वावशप्रमः । पञ्चैते विषयस्कृष्टा ज्ञेया महर्षि चक्रिणाम् ॥। १४४१ ।। गम में पृथिवी कायिक से लेकर वनस्पतिकार्यिक पर्यन्त एकेन्द्रिय जीवों के स्पर्श का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ४०० धनुष कहां है। होन्द्रिय जीवों के स्पर्श का विषय क्षेत्र ८०० धनुष है और इन्हीं द्वीन्द्रिय जीवों के रसनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र -६४ धनुष प्रमाण है। त्रीन्द्रिय के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १६०० धनुष, रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १२८ धनुष प्रमाण है और प्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १०० धनुष प्रमाण है । चतुरिन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय का क्षेत्र ३२०० धनुष रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र २५६ धनुष, प्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र २०० धनुष और चक्षुरिन्द्रय को उत्कृष्ट विषय क्षेत्र २९५४ योजन प्रमाण होता है । संजी
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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