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अध्याय : पाठवां ]
[ ५८३ कर्णेन्द्रिय का प्राकार यर की नाली के सहण, चारिन्द्रिय का प्राकार मसूर सदृश (गोल) धाणेन्द्रिय का आकार तिल के घुष्प, सदृश और जिह्वा इन्द्रिय का आकार अर्ध चन्द्र सदृश कहा गया है । .
स्पर्शनेन्द्रिय का आकार अनेक प्रकार का होता है, क्योंकि समचतुरस्त्र आदि भेदों से संस्थान छ: प्रकार के होते हैं। इन्द्रियों के मेर-प्रभेद
द्रव्य भाव विभेदाभ्यामिन्द्रियं द्विविध स्मृतम् । अन्तनिवृति बाह्मोपकरणाद- द्रव्यखं द्विविधा ।।१४२४॥ . . लम्ब्युपयोग भेदाभ्यां द्विधा मावेन्द्रिय मतम् । अन्तरात्म' प्रदेशोत्थं कर्मक्षयसमुद्भवम् ॥१४२५॥ :
द्रव्येन्द्रियों और भावेन्द्रियों के भेद से इन्द्रियां दो प्रकार की होती हैं । इनमें अभ्यन्तर में रचना और बाह्य में उपकरणों के भेद से द्रव्येन्द्रियां दो प्रकार की तथा लब्धि एवं उपयोग के भेद से कर्मों के क्षयोपशम से प्रात्मप्रदेशों में उत्पन्न होने वाली भावेन्द्रियाँ भी दो प्रकार की हैं। अब पांचों इन्द्रियों के विषयों का स्पर्श बताते हैं
पृथिव्यादि वनस्पत्यन्तै काक्षारखा मतः श्रुसे। स्पर्शाख्यो विषयो लोके धनुः शत चतुष्टयम् ॥१४२६।। होन्द्रियाणां भवेत्स्पर्श विषयो दूरती भजन ।। स्पर्शाक्षेण विषयार्थान् धनुरष्टशत प्रमः ।।१४२७॥ विषयो रसनाख्योत्यश्चतुः षष्टि धनु प्रमः । प्रोन्द्रियासुमता स्पर्श विषयः: स्पर्शन क्षमः ॥१४२८।। स्पर्शार्थानां च चापानां स्थापोडश शतप्रमः । जिद्वाक्ष विषयश्चाप शताष्टाविशति भवेत् ।।१४२६॥ प्रारणाक्ष विषय भ्याप्ति धनुषां शतमानकः । चतुरिनिय जीवानां विषयः स्पर्शनाक्षजः ।।१४३०॥ द्वात्रिशच्छत चापानि विषयो रसाक्षजः । धनुषां द्विशते षट् पञ्चाशदरसादिवित् ॥१४३११॥
MARRUKHERDARATHIमारा - HEIANRNER