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जघन्यायुरिष्यते ।
एकाक्षद्वित्रितुर्या क्षारणां कृताष्टादश भागानामुच्छ्वासस्यैक भागकः ॥ १४१६ ।। संज्ञिनामत्यमृत्यादि युता पुण्यनृणां सर्वजघन्यमंत्र च ।। १४२०।।
भवेत् !
प्रभुहूर्तमायुष्यं
पृथ्वीकाfe जीवों की उत्कृष्ट आयु बारह हजार वर्ष की, खर पृथ्वीकायिक जीवों की बाईस हजार वर्ष की, जलकायिक जीवों की उत्कृष्टायु सात हजार वर्ष की, श्रमिकायिक जीवों की तीन दिन की तथा वायुकायिक जीवों की तीन हजार वर्ष की उत्कृष्ट श्रायु हैं ।
[ गो. प्र. चिन्तामणि
वनस्पतिकायिक जीवों की उत्कृष्टायु दस हजार वर्ष, द्वीन्द्रिय जीवों की - बारह वर्ष, त्रेन्द्रिय जीवों की उनचास (४६ ) दिन की तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की उत्कृष्ट छह मास प्रमाण होती है ।
महामत्स्यों की उत्कृष्टायु एक कोटि पूर्व की, श्रर्थात् सात करोड़ छप्पन लाख वर्षों की, पक्षियों की सर्पों को बयालीस हजार वर्षो की उत्कृष्टायु होती है ।
एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की जघन्य आयु स्वांस के अठारह भागों में से एक भाग प्रभाग होती है ।
सरीसृप जीवों की नयपूर्वाङ्ग बहत्तर हजार वर्षों की और
गर्भज संशी जीवों की अल्पायु और पुण्यहीन गर्भज मनुष्यों की सर्व जघन्य मात्र अन्तर्मुहूर्त प्रसारण की होती है ।
नोट -- लब्ध्यपर्याप्तक, संज्ञी, अशी पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चों की तथा लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों की जघन्यायु प्रवास के अठारहवें भाग होती है । स्पर्शन आदि पांचों इन्द्रियों को प्राकृति-
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श्रोत्रियस्य संस्थानं यवनालसमाकृतिः । चक्षुरिन्द्रिय संस्थानं वृत्तं मसूरिकासमम् ॥ १४२१॥ संस्थानं प्रापयस्यास्त्यति मुक्त पुष्पसन्निभम् । जिह्नन्द्रियस्थ संस्थानमचन्द्र समानकम् || १४२२॥ स्पर्शेन्द्रिय सस्थानमनेका कारमस्ति च । ममादि चतुरस्त्रादि भेद भिन्नं च षड्विधय ॥ १४२३३३
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