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________________ ८] [ गो. प्र. चिन्तामणि उत्तर :- इस कषाय के उदय से जीव संयम धारण नहीं कर सकता और इसका। . स्वभाव मेढ़े के सींग के समान होता है । प्रश्न :--अप्रत्याख्यानावरग लोभ कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--अप्रत्याख्यानावरण लोभ के उदय होने पर संयमभाव कभी नहीं होता, और - इसका स्वभाव बैलगाड़ी के ओंगन (Oil) की तरह होता है । प्रश्न :...-प्रत्याख्यानावरण कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-जिस कषाय का उदय होने पर जीव सकल चारित्र धारण न कर सके या सकल चारित्र के भाव ही जीव को न हो, वह प्रत्याख्यानावरण कषाय है। प्रश्न :-प्रत्याख्यानावरण क्रोध का क्या स्वभाव है? उत्तर :---जिस क्रोध का उदय होने पर जीत हाच शयर ग्रहण न कर सके उसे प्रत्या ख्यानावरण क्रोध कहते हैं । यह धूल की रेखा के समान होती है । ये कषाय जल्दी मिटती है, फिर भी कुछ समय लगता है । प्रश्न : प्रत्याख्यानावरण मान-कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- जो मान कषाय सकल' संयमी नहीं होने दे, वह प्रत्याख्यानावरण मानकषाय है । इसका स्वभाव काष्ठ के समान होता है। प्रश्न :-प्रत्याख्यानावरण माया कषाय का क्या स्वरूप हैं ? उत्तर :- जो माया कषाय जीव को सकलसंयम धारण नहीं करने दे, उसे प्रत्याख्या वरण माया कषाय कहते हैं। इसका स्वभाब गोमुत्र के समान होता है । प्रश्न :--प्रत्याख्यानावरण लोभ कषाय का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- जिस लोभ कषाय के उदय होने पर प्रात्मा कभी सकलसंयमी न हो; उसे प्रत्याख्यानावरण लोभ कहते हैं । यह शरीर के मल के समान होता है। प्रश्न :--संज्वलन कषाय किसे कहते हैं. ? . . उत्तर :--जिस कवाय के उदय होने से जीव यथाख्यात चारित्र धारणा न कर सके। जो यथाख्यात चारित्र होने में वाधक हो, वह संज्वलन कपाय है। प्रश्न :--संज्वलन कोध का क्या स्वरूप है ?
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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