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________________ Parve अध्यायः पहला ] [७ होती है। जिस प्रकार शिला के ऊपर बनाई गई रेखा जल्दी नहीं मिटती, उसी प्रकार इस अनन्तानुबन्धी कषाय का स्वभाव है। यह कषाय जीव के . साथ भव-भवान्तर में जाती है और पीड़ा देती है। प्रश्न :--अनन्तानुबन्धी मान का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- इस कषाय का स्वभाव पाषाण के समान होता है। जिस मान की मात्रा ..: अनन्त के साथ अनुबन्ध करने की हो, वह मान अनन्तानुवन्धी-मान कहलाता ...... है । यह अनन्तानुबन्धी मान जल्दी नहीं मिटता । प्रश्न :---अनन्तानुबन्धी माया का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जिम माया की मात्रा प्रानन्द के साथ अनुबन्ध करने की हो, वह माया अनन्तानुबन्धी माया कहलाती है। इसका स्वभाव बांस की जड़ के समान होता है । यह कषाय भी भवान्तरों तक चलती है । प्रश्न :--अनन्तानुबन्धी लोभ का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--यह कषाय सम्यक्त्व का घात करती ही है और कृमि रंग के समान होतो है । जो लोभ अनन्त के साथ अनुबन्ध करने की शक्ति रखता है, वह अनन्तानुबन्धी लोभ कहलाता है। प्रश्न :---अप्रत्याख्यानावरण कषाय का क्या स्वरूप है ? - उत्तर :---जो कषाय देशचारित्र धारण करने में बाधक बनती हो, उसे अप्रत्याख्याना ..... वरण कषाय कहते हैं। प्रश्न :--अप्रत्याख्यानावर क्रोध का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जिस क्रोध की मात्रा इतनी हो कि जिससे जीव देशचारित्र धारण न कर सके, वह अप्रत्याख्यानावरण क्रोध कषाय है । प्रश्न :--अप्रत्याख्यानावरण मान कषाय का स्वरूप दृष्टान्त सहित बताइये ? उत्तर :---अप्रत्याख्यानावरण मान बह हैं, जो जीव को देशचारित्र धारण करने में बाधक होता हो और हड्डी के समान नहीं झुकनेवाला होता है । प्रश्न :--अप्रत्यानावरण माया कषाय का क्या स्वरूप है ?
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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