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[ गो. प्र. चिन्तामणि
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से आत्मा के सम्यक्त्व गुण का घात होता है, उसे दर्शन मोहनीय कहते हैं । इसके तीन प्रभेदों का स्वरूप प्रागे दर्शाते हैं ।
प्रश्न : - - मिथ्यात्व प्रकृति का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :----जिसके उदय से तत्वों का यथार्थ श्रद्धान नहीं होता है, उसे मिथ्यात्व प्रकृति कहते हैं ।
प्रश्न : सम्यक्त्व प्रकृति का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- -जिसके उदय से सम्यग्दर्शन में दोष उत्पन्न होता है, उसे सम्यक्त्व प्रकृति कहते हैं ।
प्रश्न :- सम्यक् - मिथ्यात्व प्रकृति का क्या स्वरूप है ?
- जिस कर्म के उदय से ( वस्तु के ) यथार्थ और यथार्थ मिश्रित परिणाम होते हैं, उसे सम्यक् मिथ्यात्व प्रकृति कहते हैं |
उत्तर :
प्रश्न : - चारित्र मोहनीय का क्या स्वरूप है ?
-जो आत्मा के चारित्र गुरु का घात करता हो, उसे चारित्र मोहनीय कहते हैं । चारित्र मोहनीय के उत्तर-भेदों का स्वरूप बताते हैं । मूलत: चारित्र मोहनीय के दो भेद हैं- कषाय बेंदनीय और कषाय वेदनीय |
उत्तर :
प्रश्न :- कषाय वेदनीय का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-- -जो श्रात्मा के गुण, शुद्ध भाव और धर्म को नहीं होने दे अर्थात् नष्ट करें, उसे कषाय वेदनीय कहते हैं ।
प्रश्न : --- कषाय वेदनीय का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-- जो क्रोधादिक की तरह श्रात्मा के गुणों का घात नहीं करता अथवा जो कषाय के साथ-साथ अपना कार्य या फल दिखलाता है, उसे प्रकषाय वेदनीय कहते हैं ।
प्रश्न :- ग्रनन्तानुबन्धी क्रोध का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जो क्रोध-काय सम्यक्त्व होने में बावक हो अर्थात् सम्यवत्वी न होने दे, उसे अनन्तानुबन्धी क्रोध-कपाय कहते हैं । यह शिला रेखा के समान