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अध्याय: पहला ]
प्रश्न :- प्रचला दर्शनावरण कर्म का क्या स्वरूप है ?
- जिस कर्म के उदय से जीव कुछ जागता हो और कुछ सोता हो, उस कर्म को प्रचला दर्शनावरण कर्म कहते हैं ।
उत्तर :--
[ ५.
प्रश्न :- प्रचलाप्रचला दर्शनावरण का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से सोते समय मुंह से लार वहे और कुछ
भी
चलते रहें और सुई यादि चुभोने पर भी चेत न हो, उसे प्रचला प्रचला array कर्म कहते हैं ।
प्रश्न : स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से प्राणी सोते समय नाना प्रकार के भयंकर कार्य कर डालता हो और जागने पर उसे कुछ मालूम ही नहीं होता कि मैंने क्या किया है, उस कर्म को स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण कर्म कहते हैं ।
प्रश्न
- वैवनीय कर्म किसे कहते हैं ?
उत्तर:- जिस कर्म के उदय से जीव के प्रत्यन्त आकुलता रूप परिणाम हो अथवा जिससे आत्मा के श्रन्याबाध गुरण का घात होता है, उसे वेदनीय कर्म कहते हैं । वेदनीय कर्म के प्रभेदों का स्वरूप निम्न रूप से है ।
प्रश्न: - सांता वेदनीय कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-- जिस कर्म के उदय से शारीरिक तथा मानसिक सुख प्राप्त होता है, उस कर्म को साता वेदनीय कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- असाता बेदनीय कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से आत्मा को नाना तरह के दुःख प्राप्त होते हैं, उस कर्म को सातावेदनीय कर्म कहते हैं ।
प्रश्न :- मोहनीय कर्म का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- जिस कर्म के उदय से आत्मा के सम्यक्त्व गुण और चारित्र गुण का घात • होता हो, उस कर्म को मोहनीय कर्म कहते हैं। उसके प्रभेदों का स्वरूप निम्न प्रकार से है ।
प्रश्न :- दर्शन मोहनीय कर्म का क्या स्वरूप है.