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________________ अध्याय : दसवां ] [ cre उपशांत मोह नाम के गरणस्थान तक चार गुणस्थानं होते हैं । निर्यथ नाम के मुनि के बारहवा क्षीण मोह नाम का गुणस्थान होता है तथा स्नातक के तेरहवां सयोगी केवली और चौदहवां योगी केवली गुणस्थाने होता है। इस प्रकार पुलाक बकुश कुशील निग्रंथ और स्नातक इन पांचों प्रकार के मुनियों के गुणस्थान छटे से लेकर चौदहवें तक हैं । इन सब मुनियों की संख्या ढाई द्वीप भर में अधिक से अधिक तीन कम नौ करोड़ ग्रर्थात् EEEEEE७ रहती है, उन सबको हमारा नमस्कार हो । सो ही प्राचार्य सकल कीर्ति विरचित सिद्धान्तसार में लिखा है-षष्ठ सप्तमयो यस्ते गुणस्थान द्वयोर्मुनी । विज्ञेया शास्त्ररीत्या च पुलाक बकुशाविह ॥१८५७॥ अपूर्वा शान्तेषु गुणस्थानेषु ये स्थिताः । प्रोक्तास्ते मुनिभिनित्यं कुशीलाह्वय धारिणः ॥ १८५८ ॥ श्रीमोह गुणस्थाने यस्तिष्ठेन्मुनिसत्तमः । ज्ञातोय भवभिः सर्वेनिग्रंथो हि प्रशांतधीः ॥१८५॥ योगायोग गुणस्थानो वसन्ति यतयः खलु । ये मताः स्नातकास्ते च लोकालोक प्रकाशकाः ॥ १८६० ।। सर्वेषां यतिनां संख्यास्त्रिऊना नवकोट्यः । कथिताः श्री जिनैः सर्वैस्तेषां नित्यं नमोस्तु ते ।। १८६१ ॥ प्रश्न :- एक दिन रात में तथा एक महीने में वा एक वर्ष में पुरुष के feat tereोच्छ्वास घाते-जाते हैं ? उत्तर:- एक मुहूर्त के तीन हजार सात सौ तिहत्तर श्वासोच्छ्वास होते हैं तथा एक दिन-रात के तीस मुहूर्त होते हैं । इस हिसाब से एक दिन-रात के एक लाख तेरह हजार एक सौ नब्बे श्वासोच्छ्वास हुए। सो ही लिखा है --- एकं च सय सहस् उस्सासमा तु तेरससहस्साणं । ऊu care प्रहिया दिवसणिसोहति विष्णेया ।। १८६२ ।। इसी हिसाब से एक महीने के तेतीस लाख पिचानवे हजार लात सौ प्रवासोच्छ्वास होते हैं । सो लिखा है मासे far उस्सा सा लक्खा तेतीस सय सहस्सारणं । सत्त सवाइ जारिउ कहिया हैं पुन्न सास्साहि ।। १८६३ ॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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