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________________ HTRAIAS ८६० ] { गो. प्र. चिन्तामणि इनको बारह से गुणा कर देने से एक वर्ष के श्वासोच्छ्वासों की संख्या चार करोड़ सात लाख अडतालीस हजार चार सौ होती है सो ही लिखा है । चत्तारी कोडी प्रो लक्खा सत्सेव होति पायथा ।. अड़तालीस सहस्सा चारिसया होति बरिसेश ॥१८६४॥ इनको सौ का मुसा कर देने से सौ वर्ष के चार अरब सात करोड़ अडतालीस श्वासोच्छ्वास होते हैं सो ही लिखा है-- चत्तोरिया कोडिसया कोडिय सत लक्ख अडियाला । चत्तारीस सहस्सा सासा सत होति वरिसेग ।।१८६५॥ इस प्रकार श्वासोच्छवास का प्रमाग गोमट्टसार आदि जैन सिद्धांत में लिखा है। प्रश्न :-गर्भज जीयों में मनुष्य को उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? उत्तर :--पुरुष स्त्री के संयोग होने पर स्त्री के गर्भ रहता है, सो पिता के वीर्य और माता के रूधिर के मिलने से माता के गर्भाशय में जीव आकर उत्पन्न होता है। वह अनुक्रम से बढ़ता है और फिर जन्म लेता है । इसका विशेष वर्णन इस प्रकार है-योनि के भीतर गर्भाशय में माता पिता के रजोवीर्य के इकट्टे होने पर जीव आकर उत्पन्न होता है। तदनंतर एक रात्रि में उसका कल्वल बनता है। फिर पाच रात में वह कल्वल बुद्बुदा के प्राकार में परिणत हो जाता है। फिर पंद्रह दिन में वह बुबुदा अंडे के रूप में बन जाता है, एक महीने बाद उस अंडे में मस्तक बनने का अंकर उत्पन्न हो जाता है। दो महीने बाद हृदय बनता है। तीसरे महीने में पेट बनता है, चौथे महीने में हाथ पैर बनते हैं पांचवे महीने में हाथ पैर की उंगलियां और मख निकलते हैं, छठे महीने में बाल और नेत्रों की दृष्टि प्रगट होती है, सातवें महीने में शरीर का सब याकार तैयार हो जाता है, आठवें महीने में ज्यों का स्यों बना रहकर बढ़ता है, नौवें व दशवे महीने में उस माता के गर्भाशय से वायु के द्वारा बाहर निकलता है, इसी को जन्म कहते हैं सो हो लिखा है भगवती प्रा. शिव. । कल्वलं कैकराण पंचराग बुदबुवाः । पक्षकेरणांडकं चैव मासेन च शिरांकुरः ॥१८६६।। - उरो मासद्वयं यावत् विभिश्चय तथोवरम् । ... शाखाश्चतुभिर्मासश्च नखांगुलिश्च पंचमे ॥१८६७॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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