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________________ अध्याय : दसवां । [ ८६१ रोमदृष्टी च षष्ठे च सर्वेऽवयवाः सप्तमे । नवमे दशमे वापि वायुनाऽसौ बहि भवेत् ॥१८६८॥ इस प्रकार मनुष्य की उत्पत्ति समझना चाहिये। प्रश्न :---ऊपर मनुष्यों की उत्पत्ति कही है, परंतु मनुष्यों में तीन भेद हैं पुरुष, स्त्री और नपुंसक सो एक हो गर्भ में तीन अवस्थाएं कैसे हो जाती है ? उत्तर :--जिस समय पिता का बीर्य अधिक होता है और माता का रज उस वीर्य से कम होता है तथा उस जीव के पुरुष बेद नाम कर्म का उदय होता है उस समय पुरुष उत्पन्न होता है । तथा जिस समय माता का रज अधिक होता हो पिता का वीर्य उस रज से कम हो और उस जीव के स्त्री वेद नाम कर्म का उदय रहता है, उस समय कन्या उत्पन्न होती है । तथा माता पिता का रजो बीर्य समान हो जीव के नपुसक नाम कर्म का उदय हो तो नपुसक उत्पन्न होता है सो ही लिखा है- , शुकस्याधिकतो बालः कन्धा शोपित गौरवात् । शुक्र शोरिणतयोः साम्ये पंडत्यं तस्य जायते ॥१८६९॥ पितुः शुक्काच्च मातुश्च शोषिताग भैसम्भवः । स्वकर्म परिणामेन जीवोल्पत्तिरिष्यते ॥१८७०॥ इस प्रकार पुरुष, स्त्री, नपुसक की उत्पत्ति होती है । यहां कोई प्रश्न करे कि एक स्त्री के दो बालक किस प्रकार होते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि यदि चतुर्थ स्नान की रात्रि में वह स्त्री पुरुष से दो बार संभोग करे तो उसके दो बालक उत्पन्न होते हैं । सो ही भाव प्रकाश नाम के आयुर्वेद शास्त्र में लिखा है युग्माषु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु । तथा अन्य शास्त्रों में अन्य प्रकार भी इसका वर्णन किया है। वह इस प्रकार है- जो रात्रि में संभोग समय परस्पर की हवा के घात से रजो वीर्य का पिंड अलगअलग दो जगह हो जाय और उसमें दो जीव आ जाय तथा वे दोनों ही वृद्धि को प्राप्त होते रहें तो दो बालक उत्पन्न होते हैं । सो ही चिकित्सिक में लिखा है --- . परस्परामिलाघातात् प्रभिने फलिले द्विधा । तनु प्रवृद्ध तद् युग्मे युग्मं तस्मात्प्रजायते ॥१८७१॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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