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[ गो. प्र. चिन्तामणि
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लिखा है
प्रश्न :- मनुष्य की उत्पत्ति तो समझ में श्रा मई, परंतु इस मनुष्य के शरीर में क्या-क्या पदार्थ हैं ?
उत्तर :--- मनुष्य के शरीर में से जो पदार्थ हैं, उन्हें संक्षेप से लिखते हैं । माता-पिता के संयोग होने के बाद वह रजोवीर्य का पिंड दश दिन में तो कलिल रूप होता है । उसके बाद दश दिन में कलुषी रूप श्राकार होता है । फिर दश दिन में कलुषी रूप श्राकार स्थिर होता है। यहां तक एक महीना हुआ। इसके बाद दश दिन में बुदबुदा होता है । फिर दश दिन में घनाकार होता है । फिर दश दिन बाद माँस की पेशी बनने लगती है । इस कम से दूसरे महीने में पढगल पूर्ण होता है । तदनंतर चर्म तख रोम अंग उपांग आदि अनुक्रम से ग्राठ महीने तक पहले कहे अनुसार उत्पन्न होते रहते हैं और फिर नौवें दशवें महीने में वह जन्म लेता है ।
इस शरीर में शिर, मुख, दाढी, सब शरीर के केश, बीस नख, बत्तीस दांत, मी, नाड़ी यदि सिरा नसें शुक्र ये सब पिता के गुणों से उत्पन्न होते हैं सो लिखा है
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केशाः स्मश्रु च लोमानि नखा दंता शिरस्तथा ।
धमन्यः स्त्रावयः शुक्रमेतानि पितृजानि हि ।।१८७२ ।।
तथा मांस, रुधिर, मज्जा, मेदा, कलेजा, प्लीहा, अंतडी, नाभि, हृदय, गुदा ये सब माता के गुणों से उत्पन्न होते हैं, सो लिखा है
hier मज्ज मेदांसि यकृत्प्लीहांत्र नाभयः 1
हृदयं च गुदं चापि भवत्येतानि मातृतः ॥११८७३ ॥
ऐसा fafefree भाव प्रकाश में शारीरिक सम्बन्ध में लिखा है । आगे शरीर का विशेष स्वरूप कहते हैं, पहले कहे हुए इस प्रदारिक शरीर में ३०० हड्डियां हैं, ३०० संधियां हैं, ६०० स्नायु हैं, जो कि तंतु के आकार हैं, ७०० सिरा हैं, ५०० मांस की पेशियां हैं, ४ शिरा जाल है, १६ कडरा हैं, ६ कंडमूल हैं. ७ त्वचा हैं, ७ कलेजा हैं, अस्सी लाख करोड़ रोमों की संख्या है, आमाशय में रहने वाली आंतों की पष्ठी १६, कुषिताश्रय ७, स्थूल ३, मर्मस्थान १०७ हैं, जहां पर चोट लगने से यह जीव जीवित नहीं रह सकता है। तथा ८ व्रमुख हैं जो नित्य कुथित वस्तुत्रों से बहते रहते हैं ।