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अध्याय : दसवां ]
[८६३ इस शरीर में मस्तक तो अपनी अंजुलि प्रमाण है, मेदा नाम की धातू दंडांजलि प्रमाण है, मज्जा नाम की धातु अपनी स्वांजलि प्रमाण है, वीर्य स्वांजलि प्रमाण है, बसा धातु तीन निजांजलि मात्र है, पित्त भी तीन स्वांजलि प्रमाण है, श्लेष्मा भी तीन स्वांजलि प्रमाण है, पाठ सेर रुधिर है, सूत्र नाम का उपधातु १६ सेर है, भिष्टा चौबीस हैं, नख बीस हैं, दांत बत्तीस हैं, इनके सिवाय कृमि, कीट निगोद आदि जीवों से यह शरीर भरा हुआ है, सात धातुओं के नाम ये हैं---रस, रूधिर, मांस, मेदा, हाड, मज्जा, शुक इन धातुओं से भरा हुआ यह शरीर है। ऐसा समझकर इस शरीर से ममत्व छोड़ देना चाहिये और अपने चैतन्य स्वरूप का विचारकर इस संसार शरीर से विरक्त हो जाना चाहिये । यह सब कथन श्री शिव कोटि मुनि कृत भगवती प्राराधना में लिखा है सो वहां से विचार लेना।
यहां कोई प्रश्न करे कि मनुष्य के शरीर की उत्पत्ति जो पहले कही थी, उससे यह कथन मिला नहीं सो यह विपरीतता क्यों है ?
समाधान--विपरीतता नहीं है, किंतु सामान्य और विशेष कथन हैं । प्रश्न :-तीर्थङ्कर गृहस्थाश्रम में अपने अवधिज्ञान को विचारे या नहीं ?
उत्तर :--एक बार बीसवें तीर्थकर मुनीसुन्नतनाथ गृहस्थाश्रम में ही अपने पुत्र के साथ सभा में विराजमान थे । वहां पर पट्टहस्ती का (मुख्य हाथी का) प्रसंग
आ गया था । उस समय भगवान ने अपने अधिज्ञान के द्वारा सब सभासदों को उस पट्ट हस्ती का वृतान्त कहा था 1 सो ही श्री सोमसेन कृत लघु पापुराण में बारहवीं सन्धि में लिखा है---
पट्ट हस्ती तदा मुक्तः भुक्ति करोति दुःखदाम् । तदृष्ट्वाधिनेवर जिनः प्राह जनान् प्रति ॥१८७४।।
इससे सिद्ध होता है कि तीर्थङ्कर गृहस्थ अवस्था में अवधिज्ञान को जोड़ते हैं। अवधिज्ञान के विचारने का (जोड़ने का निषेध नहीं है। प्रश्न :---देवों की जाति में दुर्गति जाति के देव सुने जाते हैं, सो क्या देवों में
भी दुर्गति है? उसर :---जो अन्य लिंगी. सिध्या तपश्चरण कर देवगलि में मिथ्यादष्टि देव होते हैं । वे देव बड़ी-बड़ी ऋद्धियों को धारण करने वाले सम्यग्दृष्टि देवों के यहां
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