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________________ 1E : wwwrememmat ure ८६४ ] (गो. प्र. चिन्तामणि काम करने वाले अभियोग्य जाति के देव होते हैं अर्थात् वे दास के समान काम करते हैं, गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं, बाजे बजाते हैं, और वाहन का (सवारी का) रूप धारण करते हैं। इनके सिवाय कितने ही कुदेव किल्विष जाति के भी हैं। ये सब जीव दुर्गति के ही कहलाते हैं तथा आयु पूरी कर स्वर्ग से चयकर तिर्यच्च गति में पृथ्वी जल अग्नि वायुकायिक बनस्पति तथा प्रसकायिक पशु पक्षी होते हैं। सो ही रविषेरणा'नार्य विरचित पदा पुराण के चौथे पर्व में लिखा है यथाप्यूद्ध वं तपः शक्तया ब्रजेयुः परोंलगिनः । तथापि किंकरा भूत्वा ते देवान् समुपासते ॥१८७५।। देवदुर्गति दुःखानि प्राप्य कर्मवशात्ततः। स्वर्गाश्च्युत्वा पुनस्तिर्यग्योनिमायान्ति दुःखिनः।।१८७६॥ इस प्रकार भगवान ऋमरमेड ने अपनी दिना स्थति के द्वारा बतलाया है। इससे सिद्ध होता है कि ऐसे देव स्वर्ग में भी दुःख देखकर मरने के बाद तिर्यञ्चगति में जन्म धारण करते हैं। यही कथन वट्टकेर स्वामी ने चारों गतियों का वर्णन करते समय भूलाचार में लिखा है फंदप्पमाभिजोग्ग किन्विसं संमोहमासुरत्तं च। ता देव दुग्गईओ मरणाम्भि विराहिए होंति ।।१८७७॥ कंदर्प पाभियोग्यं किल्विषंस्थमोहत्वंप्रासुरत्वं च । साः देवदुर्गतयः मरणे विराधिते भवंति ॥१८७८।। इस प्रकार लिखा है सो यह सब मिथ्यात्व का फल है। इसका भी विशेष वर्णन इस प्रकार है- कंदर्प, आभियोग्य, किल्विष, असुर ये देवों में उत्पन्न होते हैं । जो जीव अंत समय में समाधिमरण के बिना दुर्बुद्धि सहित मरण करते हैं, वे ही ऊपर लिखे नीच देवों में उत्पन्न होते हैं । इसका भी अलग-अलग खुलासा इस प्रकार है-- जो योगी होकर भी असत्य वचन बोलते हैं, हंसी ठट्ठा करते हैं, राग बढ़ाने वाले वचन कहते हैं, कामदेव के अशी भूत होकर कामसेवन में लीन रहते हैं और कामदेव को उत्तेजित करने वाली क्रियाएँ करते रहते हैं ऐसे खोटे योगी मरकर कंदर्य जाति के देव होते हैं । सो वहां भी वे काम-क्रिया को बढ़ाने वाले कार्य ही किया करते हैं तथा जो यंत्र, तंत्र, मंत्र आदि कार्यों को अधिकता के साथ करते हैं जो ज्योतिष वैद्यक आदि |
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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