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अध्याय : दसयां ]
। ८६५ अशुभ कार्यों को करते हैं, जो संघ वा चैत्यालय की हंसी करते हैं, अनेक प्रकार की चेष्टायें करते हैं, जो धर्मात्मानों की अविनब करते हैं. जो मायाचारी हैं और किल्दिष अर्थात् पाप कमों मे लीन रहते हैं, ऐसे पुरुष मरकर देवगति में नीच योनि में अर्थात् किल्विष जाति के देवों में उत्पन्न होते हैं । जो जीव कुमार्ग. या शास्त्र विरुद्ध मार्ग का उपदेश देते हैं, जो जिनमार्ग का नाश करने में लगे रहते है, जो सम्यग्दर्शन से सदा विपरीत चलते हैं, जो स्वयं सम्यग्दर्शन रहित हैं, महा मिथ्यात्वी हैं, जो मिथ्यात्व, मायाचारी और मोह से सदा मोहित रहते हैं तथा मोह से सदा पीडित रहते हैं ऐसे जीव मरकर भंडाभरण जाति में उत्पन्न होते हैं । जो यति होकर भी क्षुद्र, क्रोधी, दुष्ट, हिंसक, मायाचारी, दुर्जन हैं तथा जो तप और चारित्र में परम्परा से बैर बांधते चले आ रहे हैं, जिनके परिणाम सदा संक्लेशरूप रहते हैं और जो सदा निदान करते रहते हैं ऐसे जीव मरकर रौद्र परिणामों को धारण करने वाले असुर कुमार जाति के देवों में असुर होते हैं सोही मूलाचार प्रदीपक में समाधिमरण के प्रकरण में मरण के सत्रह भेदों में कहा है ।
कादर्षमाभियोग्यं च कैल्वियं किल्विषापरम् । स्वमोहत्वं तथवासुर स्वमत्वैः कुलक्षणः ॥१८७६।। सम्पमा दुद्धियो मृत्वा गच्छति देवदुर्गतीः । कंदवा इति प्रोक्ता नीचयोनि भवा दिवि ॥१८॥ असत्यं यो सुवन् हास्यसराग पचनादिकान् । कंदर्पोहोपका लोके कंदर्प रति रञ्जितः ॥१८८१॥ कदर्प संति देवा ये नाग्नाचार्याः सुरालये। कंदर्प कर्मभिस्तेषु इत्पद्यते शतशमः ॥१८८२॥ मंत्र तंत्राविकारिण यो विधत्ते बहूनि च । ज्योतिष्क मेष जादोनि परकार्याशुभानि च ॥१८८३॥ हास्य कुतूहलादीनि संघ चैत्यालयस्य च । आगमस्याविनितोय अत्यनीकः सुमिरणाम् ॥१५४॥ मायाधिकिल्विषाक्रांत: किल्वियादिकुकर्मभिः । स किल्विषसुरो नीचो भवेत्किल्विषजातिषु ॥१८८५॥ उम्मार्ग देशको योत्र जिन मार्ग विनाशकः । सन्मार्गा द्विपरीतः स दृष्टि होनः कुमार्गगः ॥१८८६॥