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[ गो. प्र.चिन्तामणि मिथ्यामायादिमोहानां मोहयन मोहपीडितः । जायते स स्वमोहेषु मंडाभरण जातिषु ।।१८८७॥ क्रोधी क्षुद्रः खलो मारी मायावी दुर्जनो यतिः । युक्तोनु बद्ध वैरेण तपश्चरित्र कर्मसु ॥१८८८।। संक्लिष्टः सनिदानो य उत्पधन्ते स कर्मणाम् ।
रौद्रासुर कुमारेषु ॥ इत्यादि लिखा है। प्रश्न :--ब्रह्मचर्य व्रत की नौ बाड़ हैं तथा अठारह हजार भेद हैं सो
__ कौन-कौन हैं ? उत्तरः --(१) स्त्री के साथ निवास नहीं करना । (२) स्त्री के रूप तथा शृगार को विकार भावों से नहीं देखना ।
(३) स्त्रियों से भाषा नहीं करना उनके मधुर वचनों को रागभावों से नहीं सुनना !
(४) पहले भोगी हुई स्त्रियों का स्मरणा नहीं करना ।
(५) काम को उद्दीपन करने वाले पदार्थ जैसे घी, दूध, मिश्री, लड्डू, मेवा, भांग, विष, उपविष, मादक (नशा उत्पन्न करने वाले) और पौष्टिक पदार्थ पारा आदि धातु, उपधातु, सोने, चांदी, मोती आदि की भस्म, रस रसायन, बलवान और वीर्य बढ़ाने वाली औषधियां तथा अन्य प्रकार के गरिष्ठ भोजन नहीं करना ।
(६) स्त्रियों के शृगार सम्बन्धी शास्त्रों को न पढ़ना, न सुनना।
(७) स्त्रियों के आसन पर नहीं बैठना तथा उनकी शय्या पर नहीं सोना ।
(८) काम कथा न कहना, न सुनना । (६) भोजन पान आदि के द्वारा पेट को पूरा नहीं भरना ।
इस प्रकार ब्रह्मचर्य की नी बाड़ हैं, सो ये सब ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये हैं । जिस प्रकार चावल गेहूं प्रादि अन्नों के खेतों में उनकी रक्षा के लिये चारों पोर कांटों की बाड़ लगा देते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये ये ऊपर