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अध्याय : दरावां ।
[ ८९७ लिखी नौ बाड हैं । जिस प्रकार बिना बाड के खेत नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार इन नौ बाडों के बिना शील का भंग हो जाता है।
___ अब प्रागे अठारह हजार शीलों के भेदों को लिखते हैं । चैतन्य रूप स्त्रियों के ३ भेद हैं, मनुष्यणी, देवांगना और तिर्यचनी । तथा अचेतन स्त्री का एक भेद है काठ, पत्थर तथा चित्रा में किसी स्त्री का रूप बनाना अचेतन स्त्री है। इस प्रकार स्त्रियों के चार भेद होते हैं । इनका त्याग मन वचन काय से तथा कृत कारित अनुमोदना से किया जाता है सो स्त्रियों के ४ भेदों को मन वचन'काय की ३ संख्या से गरणा करने से १२ भेद होते हैं और इन बारह को कृत कारित अनुमोदना की संख्या ३ से गुणा करने से ३६ भेद होते हैं । ये ३६ प्रकार के भेद पांचों इन्द्रियों से त्याग किये जाते हैं, इसलिये स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण (श्रोत्र) इन इन्द्रियों की संख्या ५ से गुणा करने से १८० भेद हो जाते हैं । इन १८० भेदों को दश प्रकार के संस्कारों से त्याग किया जाता है, इसलिये १८० को १० से गुरणा करने से १८०० भेद हो जाते हैं । उन १० संस्कारों के नाम ये हैं । स्नान, उवटन प्रादि लगाना, शृगार करना, राग बढाने वाले कार्य करना, हंसी विनोद आदि रूप से क्रीडा करना, संगीत वाद्य (गाना बजाना) विषय सेवन का संकल्प करना, दर्पण में मुख देखना, शरीर की शोभा बढाना, पहले भोगी हुई स्त्रियों का स्मरण करना और मन में चिंता की प्रवृत्ति करना ये दश संस्कार कहे जाते हैं। तथा इन १८०० भेदों का त्याग काम के दश प्रकार के वेगों से भी किया जाता है, इसलिये १८०० को १० से गुरगा कर देने से १८००० भेद हो जाते हैं । काम के १० वेग ये हैं---
१. स्त्री के मिलने की चिता होना, २. स्त्री के देखने की इच्छा होना, ३. दीर्घ श्वासोच्छ्वास लेना (लंबी सांस लेना), ४. उन्मत्त हो जाना, ५. अपने प्राणों में भी संदेह करना, ६. वीर्यपात हो जाना, ७. दुःख वा पीडित होना ८. काम ज्वर वा दाह होना, ६. अन्न में अरुचि होना, १०. मूर्छा आना ये दश काम के वेग कहलाते हैं। इनसे गुरगा कर देने से १८००० भेद हुए।
इसके सिवाय इस शील के और प्रकार से भी - १६००० भेद हो जाते हैं जिनसे शीलांग रथ बन जाता है । उन्हीं को आगे लिखते हैं।