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________________ ८६८ } [ गो. प्र. चिन्तामणि रत्नाकर में लिखा हैजेणो करंति मरणसा णिज्जिय पाहार सणि सो इंदी, पुढवीकायारंभा खंति जुनाते मुरगी बंवे ।।१८८६॥ अर्थात् मन पंचन काय, कृत कारित अनुमोदना, चार संज्ञा, पांच इन्द्रियां, पृथ्वीकाय आदि दश प्रकार के जीवों के प्रारम्भ और उत्तम क्षमा प्रादि दश प्रकार के धर्म, इनसे परस्पर गुरखा होने से १८००० भेद हो जाते हैं, इन १८००० भेदों से बने हुए शील रूपी रथ को जलाने वाले महामुनिराज होते हैं, इसलिये ऐसे मुनिराज को हम नमस्कार करते हैं। अब प्रागे शीलांग रथ की रचना लिखते हैं : मन रमावश्यागताय त्यागा ।६०००।६०००। ६००० शील के १८००० भेद जो पहले प्रकार से बतलाये हैं उनके नष्ट तथा उद्दिष्ट द्वारा प्रत्येक भेद का यंत्र कारित | अनुमत त्याग कृतः | त्याग २० २०००। २००० त्याग भय त्याम मैथुन परिग्रह स्थान | त्याग त्याम ५०० श्रोत | चक्ष । घ्राण रसना इन्द्रिय इन्दिय । इन्द्रिय इन्दिर पनिद्रिय स्था त्याग त्याग श्याग त्याग १००।१२० १०.१०० यसैज्ञी। संजी वनस्पतिपच्चीकाय| अाकाय तेजस्कायो बायकाय काय इन्द्रिय ते इन्द्रिया चतु-पचेन्द्रिय पदिय भारम्भ | चारमा प्रारम्भ | प्रारम्म [ मारम प्रारम्भ प्रारम्भ रिदिया। आरम्भ प्रारम्भ त्याग | साग । स्याम | त्याग ! वाम । स्थाग। त्यामरंभ त्याग त्याय! त्याम १४ १० उत्तम उत्तम | उत्तम 1 मार्दन | अर्जच १० उत्सम मोच उत्तम उत्तम राम संवम उत्तम तप त्याग प्राबिन बहाचर्य MarwALLA
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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