SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 989
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ .. अध्याय : दसवा ] [ ८६६ कृत अनुमोदन शील के १८००० भेदों में से नष्ट तथा उद्दिष्ट द्वारा प्रत्येक भेद को निकालने का यन्त्र मन वचन काय P भरहार मैथुन | परिग्रह स्पर्णन । रसना प्राण ७२ १०८ प्रसंशो। संझी प्रश्वीकाय अकाय | तेजस्काय वाचुकाय काय | वे इंद्रिय | तेइन्द्रिय कौन्द्रिय पंचेन्द्रिय पंचेन्द्रिय ० १ ३६० । ५४०७२०९०० १०८० | १२६० ! १४४० - १६२० क्षना ] सर्दव आर्जव । पौम ० १८०० ३६०० ५४०० सत्य | संयम रुप । स्थाय किचन्य ब्रह्मचर्य। ७२००१००० १०६० | १२६०४१४४० १६२०० इस प्रकार शीलांग रथ की रचना का यन्त्र जानना प्रागे इसी को स्पष्ट करने के लिये शील के १८००० भेद लिखते हैं। किसी स्त्री का त्याग मन वचन काय से तथा कृत कारित अनुमोदना से किया जाता है । सो इनको परस्पर गुणा करने से नौ भेद होते हैं । तथा चारों संज्ञाओं से त्याग किया जाता है, सो चार से गुरणा करने से ३६ भेद होते हैं । तथा इत ३६ का पांचों इन्द्रियों से त्याग किया जाता है सो इनको पांच से गुणा करने से १८० भेद होते हैं तथा इन १८० का त्याग पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अस्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पति कायिक, दो इन्द्रिय, ते इन्द्रिय, चौ इन्द्रिय, असंज्ञी पंचेन्द्रिय, संजी पंचेन्द्रिय इन दस प्रकार के जीवों के प्रारम्भ से किया जाता है, इसलिये १८०० भेद होते हैं । तथा इन सबका त्याग. उत्तम क्षमा प्रादि दश धर्मों के साथ-साथ धारण किया जाता है । इसलिये १८०० को १० से गगा करने पर १८००० मेंद हो जाते हैं ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy