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[म. प्र. चिन्तामणि देवगति में तो संयमी
पती ही जन्म समझना चाहिये इनमें भी ही नहीं, इसलिये मनुष्य पर्याय में ही संयम समझ लेना चाहिये । प्रश्न :-- - मुनिराज के आहार के समय का प्रमाण क्या है ? उत्तर :- तीन मुहूर्त दिन बढ़ जाने के बाद से लेकर अब तक तीन मुहूर्त दिन बाकी रहे तब तक के मध्य के समय में मुनिराज अपने नित्य कार्यों से निवृत्त - होकर अंतराय और दोषों को टालकर एक बार योग्य ग्राहार लेते हैं ।
भावार्थ - प्रातःकाल तीन मुहूर्त तक प्रहार नहीं लेते। शाम को तीन आगे नहीं लेते। मध्य के समय में सामायिक के सो ही श्री बटुकेर स्वामी विरवित मूलाचार के
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मुहूर्त दिन बाकी रहने तक लेते हैं, समय को टालकर आहार लेते हैं । ree frore में लिखा है
उदयत्थम काले गालीतियवज्जियम्हि मज्झन्हि । एकहि हु अ लिए वा मुहुसकालेयभसं सु ॥। १६५२॥ उदयास्तमनयोः कालयोः नालीत्रिक वजते मध्ये मुहूर्तकाले एकभक्त तु ।।१८५३३
एकस्मिन् द्वयोः त्रिषु वा मूलाचार प्रदीप में लिखा है
विज्ञेयोशन कालोत्र संत्यज्य घटिकाश्रयम् ।
मध्ये व योगिनां भानूदयास्तमन कालयोः ॥१८५४॥
यह जो तीन मुहूर्तकाल सुबह शाम छोड़ने का बतलाया है, वह उत्कृष्टकाल है, मध्यकाल दो मुहूर्त और अन्यकाल एक मुहूर्त सुबह शाम छोड़ने का समझना चाहिये । सो ही मूलाचार प्रदीपक में लिखा है -
तस्यैवाशन कालस्य मध्ये प्रोत्कृष्टतो जिनः ।
freeter मतो योग्यो मुहूतेक प्रमाखकः ॥। १८५५ ।।
योगिनां द्विमुहूर्त प्रमाणो मध्यमोवचदः | जघन्यस्त्रिमुहूर्तप्रभो भिक्षाकाल उदाहृतः ॥१८५६ ॥
प्रश्न :------ - पुलाक आदि मुमिराज के पांच भेद हैं, उनके कौन-कौन सा गुणस्थान है ?
उत्तर :- पुलाक और बकुण इन दो मुनियों के छठा और सातवां गुणस्थान होता है | कुशील नाम के मुनि के आठवें पूर्व करण नाम के गुणस्थान से लेकर