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अध्याय : दसवा ]
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प्रश्न :- जो लोग पैरों में जता पहने हए भगवान के मंदिर में प्रवेश करते
हैं अथवा लकड़ी की खड़ाऊ पहिनकर जिन मंदिर में जाते हैं,
जनको कसा पाप लगता है ? उत्तर :--जो लोग पैरों में जूता पहने भगवान के मंदिर में प्रवेश करते हैं, वे सात जन्म तक कोढ़ी होते हैं मार के २ जना लेते हैं और जो लोग खड़ाऊँ पहिन कर जिन मंदिर में जाते हैं, वे बढ़ई के घर जन्म लेकर सात जन्म तक कोढ़ रोय से पीड़ित होते हैं । सो ही लिखा है----
पादचस्य रुढा ये वदति श्री जिनालये । सप्त जन्म भवेत्कुष्ठी चौरीगर्भ सम्भवः ॥१८४६।। पादुकाभ्यां समागत्य ये वदंति जिनालये । सप्त जन्म भवेत्कुष्ठी बाढी का गर्भ सम्भवः ।।१८५०।। ऐसा जानकर ऊपर लिख कार्य कभी नहीं करने चाहिये । प्रश्न :-सातिशय अप्रमत नाम के सातवें गुणस्थान के अंतिम भाग से
महामुनिराज उपशम श्रेणी तथा क्षपक श्रेसी माउते हैं । इनमें से उपशम श्रेपो वाला यहां से लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक जाता है तथा फिर ग्यारहवें से नीचे गिरता है । सो इसमें प्रश्न यह है कि वे मुनिराज इस प्रकार अधिक से अधिक कितनी बार उपशम थेरणी चढ़ते हैं, कितने जन्म तक संयम धारण करते हैं और कितने समय में मोक्ष प्राप्त करते हैं अथवा उन्हें मोक्ष प्राप्त
होती है या नहीं? उत्तर :- अधिक से अधिक चार बार उपशम श्रेणी चढ़ते हैं। जो मुनिराज क्षपक श्रेणी चढ़ते हैं, दे केवलज्ञान - पर्यंत. चढ़ते ही चल जाते हैं, क्षपक श्रेणी वाले मुनि कभी निचले गुणस्थान में नहीं गिरते तथा उपशम श्रेणी बाले जीव अधिक से अधिक बत्तीस बार संयम को. पालकर पीछे नियम से मोक्ष प्राप्त करते हैं । सो ही स्वामी कातिकेयानुप्रेक्षा की टीका में लिखा है--
अत्तारिवार मुखसमसेणी समारहधि रहिदकम् । सो बत्तीसं वाराई संजममुवलहिय सिध्यागादि ॥१८५१॥