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। गो. प्र. चिन्तामणि ज्योतिर्भवन भौमेषु सम्यक्त्व प्राप्ति लोगिनाम् । किंचिद् व्रत तप: पुण्यादुत्पद्यते भवाध्वमाः ॥१८४१॥ सम्यक्त्व प्राप्ति धर्माणां स्वायुर्भवन वासिनाम् । सागराद्ध च बद्धत मिथ्यात्व शत्रु घातमात् ।।१८४२।। ज्योतिष्क व्यंतरागां चामः पल्याई प्रवद्धते । मिथ्यात्वारि विनाशेन सम्यक्त्वमणि लाभतः ।।१८४३॥ सर्वत्र विश्वदेवानां मिथ्यात्वदु विषोज्झनात् । सम्यक्त्वामृत पानेन स्वायुः रद्धतेतराम् ॥१८४४॥ त्रिलोकसार में भी लिखा है--- उवाहिदलं पल भवरणे वितरदुगे कमेरराहियं । सम्म मिच्छे धादे पल्लासंखं तु सम्वत्थं ॥१८४५॥
इस प्रकार चतुरिणकाय के देवों की आयु की वृद्धि हानि का स्वरूप सम्बग्दर्शन तथा मिथ्यात्व के गहात्म्य से समझ लेना चाहिये अर्थात् सम्यग्दर्शन के महात्म्य से ग्रायू बढ़ जाती है और मिथ्यात्व के प्रभाव से पट जाती है। प्रश्न :---चतुरिंणकाय देवों की आयु जब छह महीने शेष रह जाती है, तब
उनका तेज घट जाता है तथा उनके कंठ की माला मुरझा जाती है जिससे वे अपनी निकट पाने वाली मृत्यु को समझ लेते हैं,
ऐसा कहते हैं सो सम्यग्दृष्टि की माला मुर्भाती है या नहीं ? उत्तर :--माला आदि के मुझाने का चिन्ह मिथ्यादृष्टि के ही होता है। सम्यग्दृष्टि के नहीं होता । मिथ्यादृष्टि अपनी मृत्यु के चिन्हों को देखकर रोते हैं तथा अत्यन्त दुःखी होते हैं, सम्यग्दृष्टि के यह दुःख नहीं होता है, सो ही जंबुचरित्र को सोसरी संधि में लिखा है।
विद्वन्माली सुरस्यादो कथ्यते कथिताधुना । प्रत्यक्षं पश्य भार्याभिश्चतुभिः सहितं हितम् ॥१८४६॥ सम्यक्त्व सहितास्यास्य तेजस्तुच्छं न जायते । माला न झायते कंठे स्थिर चित्तस्य कहिचित् ।।१८४७।। सप्तमे दिवसेऽथासौ श्रु त्या भूत्वा च मानुषः । चरमांगी तपो धोरं ग्रहीष्यति जिनोदितम् ॥१८४॥