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अध्याय : दसवां
। ८८५ त्रिलोकसार में भी लिखा है--- . सम्मे घादेऊरणं सायरदलमहियमा सहस्सारा। जलहिदलम्डवराऊ पडलं पडिजारिस हारिपचयं ॥१८४०॥ प्रश्न :---यहां पर कोई प्रश्न करें कि बारहवें स्वर्ग के ऊपर के देवों के
क्यों नहीं घटती-बढ़ती ? उत्तर :-बारहवें स्वर्ग से ऊपर के स्वर्गों में जिनलिंग के सिवाय अन्य लिंग को धारण करने वाले मिथ्यादृष्टियों का गमन नहीं होता अर्थात् अन्य लिंगी मरकर बारहवें स्वर्ग से ऊपर उत्पन्न नहीं होते । बारहवें स्वर्ग से ऊपर जिन लिंग को धारण करने वाले ही उत्पन्न होते हैं । तथा बारहवें स्वर्ग से ऊपर न तो सम्यक्त्व का नाश होता है और न मिथ्यात्व की उत्पत्ति होती है। इसीलिये बारहवें स्वर्ग से ऊपर मायु के घटने-बढ़ने का नियम नहीं है। प्रश्न :--प्रायु के दो भेव हैं, निधित और निःकांचित सो इनमें से किस
मायु वाले को स्थिति घटती बढ़ती है ? उत्तर :-निधित आयु वाले की स्थिति ही घटती-बढ़ती है, जैसे--खदिरशाल नाम के भील को आयु बढ़ गई थी और राजा श्रेणिक को घट गई थी। प्रश्न :--स्वर्ग के देवों की होनाधिक आयु का स्वरूप तो ऊपर लिखे
अनुसार समझा परन्तु भवनवासी व्यंतर ज्योतिष्क देवों की प्रायु
के घटने बढ़ने की विधि किस प्रकार है ? उत्तर :--भवनवासी व्यन्तर और ज्योतिष्क इन तीनों प्रकार के देवों में जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के बिना थोड़ा सा प्रत तप करने के पुण्य से उत्पन्न होते हैं। इनमें से भवनवासी देवों के तो सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होने से आधे सागर की आयु बढ़ जाती है तथा मिथ्यात्व के उदय होने से प्राधे सागर अायु घट जाती है । इसी प्रकार ज्योतिषी और व्यंतर देवों के सम्यादर्शन के उत्पन्न होने से आधे पल्य की आयु बढ़ जाती है और मिथ्यात्व का उदय होने से आधे पल्य की प्रायु घट जाती है । तथा सब जगह सब देवों के मिथ्यात्व रूपी विष के बमन करने से तथा सम्यग्दर्शन रूपी अमृत के पीने के अतिशय से प्रायु बढ़ती है सो ही सिद्धांत सार दीपक की पंद्रहवीं संधि में लिखा है.---