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[ गो. प्रः चिन्तामणि
ARTERSTATES
उत्तर :- इक्कीस हजार वर्ष का यह पंचमकाल है । इसमें एक सौ तेईस भद्र परिणामी भव्यजीव यहां की आयु पूर्ण कर विदेह क्षेत्र में जन्म लेंगे तथा नौ वर्ष की आयु में जिन दीक्षा लेकर केवलज्ञान. उत्पन्न कर नौ वर्ष कम एक करोड़ पूर्वकाल पर्यंत विहार कर मुक्त हो जायेंगे, ऐसा सिद्धान्तसार में वर्णन किया है -
जीवा सय तेईसा पंचमकाले य भद्दपरिखामा । उत्पाई पुटव विवेहे मवमश्वर से दु केवली होदि ॥१८३७॥
इसका भी अलग-अलग खलासा इस प्रकार है पंचमकाल के इक्कीस हजार वर्ष हैं। उनके सात भाग करना सो एक-एक भाग तीन-तीन हजार वर्ष का हुआ। प्रथम के तीन हजार वर्ष के पहले भाग में यहां के ६४ जीव प्रायु पूर्ण कर विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर केवली होंगे, दुसरे भाग में ३२ जीव, तीसरे भाग में बारह जीव, चौथे भाग में आठ जीव, पांचवें भाग में ४ जीद, छठवें भाग में २ जीव और सातवें भाग में एक जीव अपनी आयु पूर्ण कर विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर केवली होंगे । इन सब जीवों की संख्या एक सौ तेईस होती है, अर्थात् एक सौ तेईस जीव इस पंचमकाल में उत्पन्न हुए एक भवावतारी समभाना चाहिए । प्रश्न :- स्वर्गलोक में सभ्यष्टि जीव सथा मिश्याइष्टि जीव उत्पन्न होते
हैं, सो वहां पर दोनों को आयु समान है अथवा होनाधिक है ? । उत्तर :--जिसके स्वर्ग में हो मिथ्यात्वरूपी शत्रु के नाश होने से सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति हुई है, उसको सम्यग्दृष्टि देव कहते है । उसके आयु कर्म की जितनी स्थिति है, उसमें सभ्यग्दर्शन के प्रभाव से घातायुष्क की अपेक्षा आधा सागर आयु की स्थिति बढ़ जाती है । यह वृद्धि भी सहस्त्रार स्वर्ग तक (बारहवें स्वर्ग तक) होती है । इसी प्रकार जिस जीव के सम्यग्दर्शन का घात हो जाय और मिथ्यात्व का उदय हो जाय तो उस देव की आयु कर्म की स्थिति में से प्राधे सागर की आयु घट जाती है ? यही बात सिद्धान्त सार में पन्द्रहवीं संधि में लिम्बी है.---
सम्यक्त्वस्य देवस्य सागरार्द्ध हि बर्द्धते। प्रायः यावत्सहस्त्रारं मिथ्यात्वारी विधातनात् ।।१८३॥ ... मिथ्यात्वागत देवस्य सम्यक्त्वरत्न नाशनात् । होयते सागराद्धीयुरिति स्थितिश्च नाकिनाम् ॥१८३६॥