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अध्याय : दसवां ।
[ २८३ प्रश्न-स्नान के कौन-कौन भेद हैं ?
उत्तर-स्नान के पांच भेद हैं, पादस्नान (पैर धोना), जानुस्नान (धुटने से नीचे का भाग धोना), कटिस्नान (कमर से नीचे का भाग धोना), ग्रीवास्नान (गले से नीचे का भाग धोना). शिरस्नान (मस्तक सक स्नान करना) इन पांच स्नानों में से जैसा दोष हो वैसा ही स्नान करना चाहिये । सो ही त्रिवचार में लिखा है--
पान जानुकटि ग्रीवाशिरः पर्यन्स संश्रयम् । स्नान पंचविधं ज्ञेयं यथा दोष शरीरिणाम् ॥१८३५।। इस प्रकार पांच प्रकार का स्तान जानना । प्रश्न- इस अवपिरणी काल में मनुष्यों की प्रायु घटती जाती है सो किस
प्रकार घटती है?
उत्तर-श्री महावीर स्वामी के मुक्त होते समय मनुष्यों की उत्कृष्ट प्रायु एक सौ बीस वर्ष थी ! इसमें से एक-एक हजार वर्ष पीछे पांच-पांच वर्ष की घटती होती है, सो ही सिद्धान्तसार में लिखा है----
वस्साराणां सहस्त्रेषु गतेषु न्यूनता प्रजेत् । पंचवर्षाणि शतंचाद्धं घेदितव्यं जिनापमे ११८३६॥
इससे सिद्ध होता है कि एक-एक हजार वर्ष में पांच-पांच वर्ष कम होते जाते हैं ! यह पंचमकाल इक्कीस हजार वर्ष का है, इसलिये छठे काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की उत्कृष्ट अायु पन्द्रह वर्ष की रहेगी । शेष एक सौ पांच वर्ष की घट जायेगी। इसका भी खुलासा यह है कि एक हजार वर्ष में पाँच वर्ष घटते हैं, इसलिये दो सौ वर्ष में एक वर्ण घटता है । सौ वर्ष में छह महीने की प्रायु घटती है । छह महीने के एक सौ अस्सी दिन हुए और १०८०० घड़ियां हुई। इनमें सौ का भाग देने से एक वर्ष में १०८ धड़ियां अथवा १ दिन ४८ घड़ियां घटीं । एक महीने में ६ घड़ियां घटीं । ६० पल की एक घड़ी होती है सौ ६ घड़ियों की ५४० पल हुए। इनमें तीस का भाग देने से एक दिन में १७ पल की घटती होती है । इस प्रकार प्रायु के घटने का खुलासा समझ लेना चाहिये ।। प्रश्न :-इस पंचमकाल में उत्पन्न हुए जीव मरकर विदेह क्षेत्र में उत्पन्न
होकर मोक्ष जा सकते हैं या नहीं अर्थात् ऐसे एक भयावतारी जीव हैं या नहीं हैं.?